"सिर्फ आम सड़ा है या टोकरी भी ?" -कुछ लोगों के बुरा होने से सारी इंडस्ट्री/पार्टी/संगठन को बुरा नहीं कहा जा सकता। यदि इस तर्क को दूसरे नजरिए से देखें तो चंद लोगों के अच्छा हो जाने से किसी क्षेत्र/राज्य/देश को भी अच्छा नहीं कहा जा सकता।लेकिन हकीकत यह है कि व्यवहार में ऐसा होता है। इंसान जिंदा होता है जो किसी बेजान/बेजुबान/अमूर्त पार्टी या संगठन या इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व करता है। जब किसी पार्टी या संगठन की स्थापना होती हैं ,उसके संस्थापकों द्वारा उसका उद्देश्य या मूल्य निर्धारित किया जाता है। किंतु यदि किसी पार्टी या संगठन का मूल्य तो महान हो और उसका प्रतिनिधि मूल्यविहीन/ चरित्रहीन हो तो व्यक्ति और पार्टी दोनों पर प्रश्न खड़े होते हैं। बुरे लोगों का समूह संगठन को गिरोह में तब्दील कर देता है तो अच्छे लोगों का समूह संगठन को संघ में तब्दील कर देता है- बुद्धम् शरणं गच्छामि,संघम् शरणं गच्छामि।। होशियारी तब देखी जाती है जब एक विवेकानंद के कारण पूरा देश आध्यात्मिक कहलाने का गौरव हासिल कर लेता है किंतु एक अपराधी को अपना मानने तक से इंकार कर देता है और उसे अपवाद मान लेता है। यह दोहरी नीति आज की समस्या के मूल में है। सिक्के के दोनों पहलुओं को या तो स्वीकार करो या अस्वीकार करो। दरअसल अच्छा या बुरा व्यक्ति होता है किंतु उसकी _अच्छाई का फायदा अन्य लोग उठाने के लिए उसे किसी पार्टी या संगठन से जोड़ देते हैं और उसकी _बुराई के खामियाजे से बचने के लिए व्यक्ति और संगठन में दूरी बताने लगते हैं।__ जीवन में अच्छा और बुरा दोनों मिला हुआ है। चुनाव अच्छा और बुरा में से एक को करना हो तो कोई भी चुनाव कर ले। किंतु जिंदगी में चुनाव मिश्रित विकल्पों में से करना होता है। गांधी,नेहरू,सुभाष जैसे व्यक्तित्वों के कारण राजनीति और नेता शब्द ऊंचाइयां प्राप्त कर लेते हैं किंतु आज ये दोनों शब्द समादृत नहीं रहे क्योंकि राजनीति में अधिकतर नेता ऐसे हुए जिनके कारण इन दोनों शब्दों की इमेज विवादास्पद हो गई। कोई पार्टी या संगठन चाहता है कि उसकी गौरव गरिमा बरकरार रहे तो उसको त्वरित गति से टोकरी के सड़े हुए एक आम को भी अलग करना होगा; अन्यथा वह सड़ा आम टोकरी के सारे आमों को सड़ा देगा और टोकरी को भी। किंतु आज सड़े आमों को संगठन सुरक्षा देता है ,और एक या दो अच्छे लोगों का मुखौटा बना लेता है। आज का युग राजनीति और अर्थ प्रधान है जिसमें संख्या और मनी सर्वोपरि है। धर्म प्रधान युग में गुण सर्वोपरि होता था। जब महात्मा और दुरात्मा के वोट का मूल्य एक ही हो और दुरात्मा अर्थ पैदा करने में ज्यादा सफल हो तो सारा प्रोत्साहन दुरात्माओं को मिलने लगता है क्योंकि महात्मा बनने में बहुत लंबी और कठिन तपश्चर्या करनी पड़ती हैं। अत: पार्टी/ संगठन/इंडस्ट्री मुखौटा तो महात्मा का बना लेते हैं किंतु दुरात्माएं संख्या बल में अधिक और बहुत सक्रिय हो जाती हैं। जब अच्छाई शक्तिहीन,अल्पमत और निष्क्रिय हो और बुराई शक्तिशाली, बहुमत तथा सक्रिय हो तो जो व्यवस्था विकसित होती है वह आज की ड्रग्स, सेक्स और अपराध की मिश्रित(Cocktail) व्यवस्था है,जिसे प्रचारऔर तंत्र का सुदृढ़ आधार मिला हुआ है। सड़ी गली व्यवस्था के विरुद्ध जब कोई आवाज उठाता है तो वह प्रायः अकेला पड़ जाता है क्योंकि चल रही स्थापित और शक्तिशाली व्यवस्था को डिगा पाना इतना आसान नहीं। लेकिन अंतरात्मा की सच्ची आवाज को रोक पाना भी बहुत मुश्किल होता है। व्यवस्था के अंदर से यदि कोई पीड़ित व्यक्ति गलत के विरुद्ध आवाज उठा रहा है तो वह जिस थाली में खाता है उसी थाली में छेद नहीं कर रहा है बल्कि वह थाली को साफ करके चमकाना चाहता है अन्यथा थाली में छेदों की संख्या बढ़ जाने से वह चलनी भी बन सकती हैं - "तुम जी रहे हो जिस कला का नाम लेकर , कुछ पता भी है कि वह कैसे बची है ?सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े हो , वह हम ही बदनाम लोगों ने रची हैं।।" - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹