क्लास की ओर लौटने की बेचैनी -विश्वविद्यालय की परीक्षाएं चल रही हैं। गौर से देखने पर यह अनुभव में आया कि परीक्षा देने से ज्यादा ध्यान विद्यार्थी एक दूसरे के साथ उठने-बैठने, गपशप करने और घर की चारदीवारी के बाहर आकर घूमने पर दे रहे हैं। दो गज की दूरी का लाखों बार प्रचार-प्रसार किया गया लेकिन मिलते ही विद्यार्थी एक दूसरे को गले लगाने को बेताब दिखे। माना कि संक्रमण का खतरा बहुत ज्यादा है किंतु एक दूसरे से मिलने के आनंद के सामने नियमों की याद कहां आती है? अधिकतर विद्यार्थियों का यही सवाल था कि कॉलेज में पढ़ाई कब से शुरू होगी? वीडियो और E-कंटेंट की पढ़ाई उन्हें जरा भी रास नहीं आ रही। उनकी नजरों में स्मार्टफोन बातचीत करने और मनोरंजन करने से ज्यादा काम का नहीं है। विद्यार्थियों के मन में यह बात बसी हुई है कि पढ़ाई का मतलब किताब हाथ में हो और शिक्षक साथ में हो। कुछ विद्यार्थियों से बातचीत करने पर और ऑनलाइन पढ़ाई का उपदेश देने पर उनका दार्शनिक अंदाज सामने आया -सर!दो दिन की जिंदगी को मजे से जी लेने दो ,नहीं पता कब कोरोना हो जाए। परीक्षा रूम तक ही उनके लिए परीक्षा की घड़ी थी। उसके पहले और बाद में उनकी बातचीत को सुनकर ऐसा लगा कि वे जिंदगी को पूरा जी लेना चाहते हैं। खासकर छात्राओं के लिए तो कॉलेज आना ,सहेलियों से मिलना,क्लास में पढ़ना,विभिन्न गतिविधियों में भाग लेना स्वर्गिक आनंद के समान था जिसे कोरोना ने उनसे छीन लिया। तब मुझे एहसास हुआ कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,यांत्रिक नहीं। यंत्र का भी उपयोग वे सामाजिकता को बढ़ाने के लिए करते हैं, अकेले होने और खुद में सिमटे रहने के लिए नहीं। कोरोना ने कोहराम मचा रखा है किंतु युवाओं के दिल में कुछ और ही तूफान उठ रहे हैं। "जिंदगी है बेवफा , लूट प्यार का मजा .... का फलसफा हकीकत की दुनिया से उन्हें दूर ले जा रहा है। जिन नेताओं और अभिनेताओं को वे आदर्श मानते थे, उनकी हकीकत कुछ और रूप में टेलीविजन के पर्दे पर आ रही हैं। पढ़ने और पढ़ाने की दुनिया में गति प्रदान कराने वाला शिक्षक उनसे दूर होता जा रहा है। ऐसे में उनका जीवन पानी में बहते प्रसून सा हो गया है-" यह मेरा एकाकी जीवन कहाँ-कहाँ भटकेगा जाने ?पानी में बहते प्रसून सा कहां-कहां अटकेगा जाने?? शिक्षकों की पीड़ा यह है कि वे उन विद्यार्थियों का सहारा बनना चाहते हैं किंतु ऑनलाइन से आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। लहरों की गति ही इंगित है ,परवश हूं मैं यही नियति है । धारा से तट , तट से धारा कब तक यूं झटकेगा जानें??... ऐसी परिस्थितियों और मन:स्थितियों में जो विद्यार्थी अपने डाउट्स या प्रश्नों के साथ शिक्षक के पास आना चाहते हैं ,उनके लिए तो रास्ता बनाना ही होगा। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹