आइकॉन जैसा देश वैसा
September 27, 2020"आइकॉन जैसा देश वैसा" - टीवी,स्मार्टफोन,नेट कनेक्शन जैसी संचार की सुविधाएं उस समय नहीं थीं किंतु गांधी जी द्वारा उठाए गए प्रत्येक कदम और दिए गए हर संदेश जनता के बीच आम-चर्चा के विषय थे। हस्तलिखित पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से सामान्य जनता के मानस को स्वतंत्रता के लिए तैयार किया जा रहा था। शिक्षा के प्रचार-प्रसार और समाज सुधार के लिए गंभीर बातें गली-गली में बहस के मुख्य मुद्दे थे। गरम दल और नरम दल के तौर तरीकों पर जनता सहमति और असहमति जता रही थी। सत्य,प्रेम, अहिंसा के गांधी-मार्ग को अपनाया जाए या सुभाष,आजाद,भगत सिंह के क्रांति-मार्ग को; इस पर देश चिंतन- मनन कर रहा था। नर-नारी, युवा-वृद्ध सभी के आदर्श चरित्रवान, त्यागी,तपस्वी लोग थे। गुलामी की बेड़ियां जकड़ी हुई थीं और गरीबी चारों तरफ पसरी हुई थीं किंतु भारत का मन बहुत अमीर होता जा रहा था क्योंकि स्वतंत्रता के लिए भारत सत्याग्रह का संकल्प ले रहा था। उस समय सुविधाएं आज से बहुत कम थी किंतु लोगों की जिंदगी में आशा और उत्साह आज से ज्यादा था क्योंकि उनके आईकॉन चुनने का आधार सच्चरित्रता और मन-वचन-कर्म की एकता थी। आज आइकॉन चुनने का आधार आय और प्रिंट व सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि हैं। Forbesपत्रिका ने अभी भारत के 100 सेलिब्रिटीज के नाम और उनकी रैंकिंग दी है,जिसमें अधिकतर क्रिकेट खिलाड़ी और फिल्मी सितारे हैं और उसमें दीपिका पादुकोण टॉप 10 में है। चयन का आधार बताता है कि यदि किसी डॉक्टर ने कोरोना संक्रमितों की सेवा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए या किसी शिक्षक ने दूरदराज के अभावग्रस्त क्षेत्र में ज्ञान के प्रसार के लिए अपना सर्वस्व लुटा दिया या किसी अफसर ने राजनीतिक दबाव के आगे न झुकते हुए सत्य को सामने लाकर तबादला स्वीकार किया या कोई वैज्ञानिक दिन-रात वैक्सीन की खोज में लगा हुआ है या कोई गरीब का बेटा-बेटी IIT या आईएएस एग्जाम में टॉप कर गया या किसी नागरिक ने जिंदगी भर की कमाई घर को पैदल लौटते मजदूरों को खिलाने में लगा दी तो वह सेलिब्रिटी की लिस्ट में स्थान नहीं बना सकता क्योंकि न तो इनके पास इनकम है और न प्रिंट या सोशल मीडिया की लोकप्रियता। ऐसे में गांधी के सपनों का भारत कैसे बन सकता है? जो देश कभी गांधी के उठने- बैठने,चलने-बोलने, खाने-पीने की चर्चा किया करता था, उस देश की मीडिया दिन-रात महीनों से ड्रग्स की चर्चा कर रहा है तो हमारा समाज कैसा होगा? आज भी गांधी हैं और आज भी सत्याग्रह चल रहा है किंतु जो देश व्यक्ति के आंतरिक गुणों सत्य, ईमानदारी, बलिदान से प्रेरणा पाता था,उस देश को बाजारवादी व्यवस्था गलत पैसा और झूठी शोहरत कमाने वाले लोगों को आइकॉन बना कर गुमराह कर रही हैं -" _हुए इस तरह खम जमाने के हाथों, कभी तीर थे अब कमां हो गए हम ; न रहबर कोई न रफीके-सफर है, यह किस रास्ते पर रवां हो गए हम??? "-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹