अंतिम संस्कार की कामना- बेटी के साथ अत्याचार-दुराचार के बाद व्यक्ति-समाज-राज्य को शर्मिंदगी तो झेलनी पड़ ही रही थी किंतु बेटी के अंतिम विदाई की रस्म पूरी करने और उसका मुंह देखने तक से मां-बाप-परिवार को वंचित कर हृदयहीनता की हद कर दी गई। मां आंचल पसार कर और बाप हाथ जोड़कर विनती करता रह गया।'परिवार हिंदू रीति- रिवाज के मुताबिक बेटी को हल्दी लगाकर विदा करना चाहता था'- इस सामान्य मानवीय इच्छा की भी पूर्ति पाषाण-हृदय द्वारा नहीं की गई। पहले तन को कुचला गया,फिर मन को कुचला गया और अंत में आत्मा को। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी? बेटी ने कौन सा गुनाह किया था? परिवारवालों को किस पाप की सजा मिल रही है? यही व्यक्ति-समाज-राज्य कल गांधी-जयंती मनाएगा और उनकी प्रार्थना दुहराएगा- वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे- बापू के कदमों पर चलने की कसमें खाएगा। किंतु यह दिखाई नहीं देता कि राजनीतिक कार्यक्रमों के साथ मोहनदास ने आंतरिक शुद्धि का कितना बड़ा यज्ञ लगातार किया। प्रार्थना,मौन,उपवास,व्रत,क्षमायाचना, प्रायश्चित ने उनके मन को कभी दानव बनने नहीं दिया बल्कि मानव को महामानव में तब्दील कर दिया। राजनीतिक सुधार के पहले सामाजिक सुधार का कितना बड़ा अभियान उन्होंने चलाया।वे बार-बार कहते थे कि असत्य-घृणा-हिंसा के आधार पर यदि हमें स्वतंत्रता मिलती हो तो मैं ऐसी स्वतंत्रता कदापि नहीं लूंगा। स्वतंत्रता के बाद कोई भी देश इतना पतित नहीं हुआ जितना भारत। गांधी की आत्मा आज भी कराहती है और हमसे पूछती है-" मैंने स्वतंत्रता का जश्न इसीलिए नहीं मनाया था कि घृणा-हिंसा में जलता हुआ देश स्वतंत्रता को कैसे संभाल पाएगा?" घर की चारदीवारी में बंद रहने वाली कस्तूरबा को महात्मा ने अपने आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए आगे कर दिया और आंदोलन का स्वरूप ऐसा था कि भारत की नारियां सड़कों पर निकल पड़ीं और अपनी सृजनशीलता तथा सहभागिता से एक नए भारत को जन्म दिया। उसी महात्मा के देश ने आज बेटियों और नारियों की स्थिति क्या कर दी है? कोरोनावायरस तो भले ही एक दिन खत्म हो जाए क्योंकि वैक्सीन बनाने में पूरी दुनिया लग गई है किंतु नफरत-घृणा का वायरस कभी खत्म नहीं होगा क्योंकि इसका वैक्सीन सत्य-प्रेम-अहिंसा के अतिरिक्त दूसरा नहीं है, जिसे हमने तिलांजलि दे दी है।। जन्म देने वाली नारी की स्थिति ऐसी ही रही तो गांधी की आत्मा कभी श्राप भी देगी-" फिर मत तरसना कभी मां की लोरियों के लिए , मत इंतजार करना रक्षाबंधन की डोरियों के लिए । न तो प्रेमिका बनकर तेरे सूने जीवन में कोई बहार लाएगी , न तो बेटी बनकर कोई आंगन में खिलखिलाएगी।। "-'शिष्य- गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹