क्या गांधी बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा के पक्ष में आज खड़े होते? -हम सभी बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा के पक्ष में खड़े हैं। किंतु गांधी कभी भीड़ के साथ नहीं खड़े होते थे, वे अपनी आत्मा के साथ खड़े होते थे। जहां तक गांधी को मैंने पढ़ा है,वहां तक मेरी समझ में यही आया है कि गांधी फांसी की सजा के पक्ष में नहीं होते क्योंकि उनकी दृढ़ मान्यता थी कि हर व्यक्ति में सत्य का अंश है- ईशावास्यमिदं सर्वम् । यदि कोई गलत रास्ते पर है तो उसका कारण उसका अज्ञान है। गांधी आंतरिक और बाह्य शुद्धता पर जोर देते।वे अश्लील साइट्स और नशा-ड्रग्स पर पाबंदी के लिए आमरण अनशन शुरू कर देते। साथ ही सामाजिक सुधार के लिए बहुत बड़ा जनजागरण अभियान चलाते। ह्रदय-परिवर्तन में उनकी अटूट आस्था थी क्योंकि वे पाप से घृणा करते थे,पापी से नहीं। आज की राजनीति समस्या के मूल कारणों पर गौर नहीं कर रही। जड़ों को काटने से पाप के वृक्ष खत्म होंगे,पत्तियों के काटने से नहीं"कहां हृदय-प्रधान गांधी और कहां आज की हृदयहीन राजनीति?" इन दोनों में कोई साम्य नहीं;फिर भी भारत का सौभाग्य कि एक धार्मिक और हार्दिक प्रवृत्ति का व्यक्ति राजनीति के क्षेत्र में कूदा। धार्मिक सत्य का आग्रही होता है जबकि राजनीतिक सत्ता का। लेकिन 50 वर्षों तक मोहन राजनीति में सत्य के प्रयोग करते रहे और सत्य,प्रेम,अहिंसा के सिद्धांत पर भारत की जनता को खड़ा कर दिया। तभी तो लोग लाठियों से पीटे जाते किंतु अपने हाथ तक नहीं उठाते। ऐसे अहिंसक आंदोलनों से निबटने का तरीका ब्रिटिश सरकार को मालूम ही नहीं था। दमन की नीति के कारण एक तरफ ब्रिटिश सरकार बदनाम होती चली गई और दूसरी तरफ गांधी विश्वविख्यात होते चले गए। उनका हृदय इतने प्रेम से भरा था कि वे अंग्रेजों से भी घृणा नहीं करते थे। अच्छे कम्युनिकेटर नहीं होने के बावजूद गांधी के हृदय की भाषा नर-नारी,बालक-वृद्ध सब तक पहुंच गई। जब असहयोग आंदोलन उफान पर था तब उन्होंने चौरीचौरा की हिंसा की घटना के कारण सभी बड़े नेताओं के विरोध के बावजूद हृदय की आवाज पर उसे तुरंत स्थगित कर दिया और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश सरकार मुश्किल में थी तब भी अपने उसूलों के कारण उसका फायदा उठाने से इंकार कर दिया। उनके आलोचक बोलते रहे कि हृदय की आवाज पर राजनीति नहीं की जाती किंतु गांधी ने मरते दम तक अंतरात्मा की आवाज के साथ कोई समझौता नहीं किया। मूल्यों के लिए अपनी जान को कुर्बान करने वाले हृदय-प्रधान गांधी की जयंती हम मूल्यविहीन और हृदयहीन लोग कैसे मना पाएंगे? हम मस्तिष्क-प्रधान लोगों की अक्ल जितनी बारिक हो गई है, रूह उतनी ही तारीक हो गई है। - " गोडसे ने तो सिर्फ नश्वर शरीर को मारा , किंतु गांधीवाद को अमर कर दिया। हम गांधीवादियों ने सिर्फ खादी संवारा और उन्हें पत्थरों में बेखबर कर दिया।।" 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे गांधी-शास्त्री जयंती की शुभकामनाओं के साथ 🙏🌹