आनन रहित सकल रस भोगी , बिनु बानी बकता बड़ योगी ।असि सब भांति अलौकिक करनी , महिमा जासु जाई नहीं बरनी।।
October 3, 2020साधन और साध्य की पवित्रता -मैं जब कभी गांधी को पढ़ता हूं और उनके ऊपर सोचता हूं तो मुझे इस लोक से परे एक अलौकिक शक्ति का आभास होता है- " आनन रहित सकल रस भोगी , बिनु बानी बकता बड़ योगी ।असि सब भांति अलौकिक करनी , महिमा जासु जाई नहीं बरनी।।" मोहनदास दर्शनशास्त्री नहीं थे किंतु जगत को एक नितांत नया गांधी-दर्शन दे गए। करमचंद की शैक्षिक उपलब्धि प्रभावित करने वाली नहीं थी किंतु शिक्षा जगत को बुनियादी शिक्षा का एक शिक्षा-शास्त्र दे गए। गांधी अर्थशास्त्री भी नहीं थे किंतु स्वावलंबी ग्राम और आत्मनिर्भर भारत की नई संकल्पना दे गए जिसे आज अपनाया जा रहा है। वे न तो राजनीतिशास्त्र के ज्ञाता थे और न उनकी प्रवृत्ति राजनीतिक थी किंतु भारत ही नहीं विश्व की राजनीति को सत्याग्रह का एक मंत्र दे गए। वे प्रभावशाली वक्ता नहीं थे किंतु पूरी दुनिया उनकी एक आवाज पर खड़ी हो जाती थी। जब कभी सोचता हूं कि ऐसा कैसे संभव हुआ तो एक ही उत्तर मिलता है- "साधन और साध्य की पवित्रता में उनका अटूट विश्वास।" सत्यमेव जयते की घोषणा करने वाले देश में आज कोई नहीं पूछता की किस तरह कोई व्यक्ति या पार्टी शीर्ष स्थान पर पहुंची? साधन कैसे भी हों, धनबल-बाहुबल-छलबल किसी भी उपाय से एक बार जीत हासिल कर लो; यह आज की सोच है। जो भी जीत जाता है वही अपने आपको सत्य बताने लगता है जबकि गांधी पवित्र मार्ग पर पवित्र तरीके से चलने के पक्षपाती थे फिर चाहे मंजिल मिले या नहीं मिले। चरमोत्कर्ष पर असहयोग आंदोलन को वापस लेना या मुसीबत में पड़े हुए ब्रिटिश सरकार की परिस्थिति का फायदा नहीं उठाना- सिद्ध करता है कि उनके लिए साध्य से ज्यादा महत्व साधन की पवित्रता का था। अतः वे असत्य-घृणा-हिंसा के आधार पर मिलने वाली स्वतंत्रता को लेने को तैयार नहीं थे। सत्य- प्रेम-अहिंसा उनका मार्ग भी था और मंजिल भी। प्रैक्टिकल बनो के मंत्र के आधार पर आजकल लोग सारे आदर्शों को तिलांजलि दे देते हैं तो फिर-" बोए पेड़ बबूल के , आम कहां से होय?" आपराधिक चरित्र के जनप्रतिनिधियों की बहुतायत देश में हो गई है और हम चिंता करते हैं कि व्यभिचार-दुराचार-भ्रष्टाचार क्यों बढ़ रहा है? चारों तरफ अपवित्र माहौल का सृजन हम सभी ने किया है और फिर पूछते हैं कि बेटियां सुरक्षित क्यों नहीं है? क्योंकि गांधी के साधन और साध्य की पवित्रता को हमने छोड़ दिया- " अजब लोग हैं ,रहम आता है इन पर ; जो कांटे बो कर जमीं से गुलाब मांगते हैं। गुनहगार तो नजरें हैं आपकी , वरना कहां ये फूल से चेहरे नकाब मांगते हैं??" - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹