संवाद
October 8, 2020"संवाद" विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस (10 अक्टू.)- एक तरफ नाबालिग से दुराचार करके उसकी हत्या कर देना और उसका वीडियो बना लेनेवाला मन समझ में नहीं आ रहा तो दूसरी तरफ देवभूमि हिमाचल में जन्म लेकरIPS,CBI-Director,VC,Governor जैसे पदों को सुशोभित करने वाले अश्विनी कुमार जी द्वारा 70 साल की उम्र में सुसाइड कर लेने वाला मन भी समझ में नहीं आ रहा। बचपन से एक मंत्र सुनते आए हैं- ' मन के हारे हार है,मन के जीते जीत '- किंतु उस मन की समझ विकसित करने का विशेष शिक्षण-प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं होता। आधुनिक वैज्ञानिक शोधें कहती हैं कि 80% से अधिक बीमारियों का कारण मन है। ऋषि कहते हैं कि मन चाहे तो जीवन को स्वर्ग बना दे या नरक- मन एवं मनुष्यानाम् कारणं बंधमोक्षयो:. व्यक्तित्व की तीन परतें तन,मन, आत्मन् में से मन के ज्यादा प्रभावी होने के कारण मानव शब्द का चयन भारतीय संस्कृति में व्यक्ति के लिए किया गया। व्यवहार में तन का रोग तो हम तुरंत बता देते हैं किंतु मन का रोग सबसे छुपाते हैं-" अब ऐसे भी दिन आने लगे हैं, हम खुद पर तरस खाने लगे हैं। पहले मन की बात सब से कहते थे , पर आजकल छुपाने लगे हैं।।" एक सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य के संबंधों का असर उसके व्यक्तित्व पर सर्वाधिक पड़ता है। आजकल पारिवारिक विघटन,अलग-थलग पड़ जाना, प्रतियोगी चित्त और उपभोक्तावादी तथा उपयोगितावादी दृष्टि ने अवसाद से लेकर आत्महत्या तक की घटनाओं में अप्रत्याशित बढ़ोतरी कर दी हैं। अतः समाज में मन के निर्माण पर स्वस्थ बहस की आज सर्वाधिक आवश्यकता है। दिल तो पागल है गाने की पंक्ति मन के बारे में सत्य कहती है क्योंकि ये दिल मांगे मोर । प्राचीन समय में जब सुविधाओं का घोर अभाव था तब शारीरिक स्वास्थ्य एक प्रमुख समस्या थी किंतु आज जब हर प्रकार की सुविधाएं बढ़ गई हैं तब मानसिक स्वास्थ्य एक प्रमुख समस्या के रूप में चुनौती बनकर उभरी है। जीवन की शुरुआत ब्रह्मचर्य आश्रम से कराने की परंपरा हमारे यहां थी जिसका मूलमंत्र था-' सादा जीवन उच्च विचार ।' गुरु का जीवन इसका जीता जागता प्रमाण था। प्रकृति की गोद में पशु-पंक्षियों के साथ रहने पर और स्वाध्याय की प्रवृत्ति पर सर्वाधिक जोर था। त्याग-तपस्या के इस बुनियाद पर जो जीवन तैयार होता था, वह गृहस्थ-आश्रम में थोड़ी सी सुविधाओं से बहुत ज्यादा सुखी महसूस करता था। आज विद्यार्थी जीवन में जो सुविधाएं उपलब्ध हैं,वह प्राचीन काल में अमीर गृहस्थों को भी उपलब्ध नहीं थी। आज मन को चंचल बनाने का चारों तरफ परिवेश और प्रेरणा है। मन तो बंदर है और उसे शराब पिलाकर बिच्छू से डंक मरवा दिया जाए तो जो स्थिति होगी वही आज सामान्य मन की हो चुकी है। कोरोना-महामारी ने तो चारों तरफ भय-असुरक्षा का ऐसा वातावरण तैयार किया है कि मनोरोगियों की संख्या नियंत्रण के बाहर होती जा रही हैं। ऐसे में ज्ञान और ध्यान का यज्ञ ही महासंकट से निजात दिला सकता है। इस समय की जरूरत है कि परिवारों और शिक्षालयों का सारा ध्यान और ज्ञान अधिकाधिक मन पर केंद्रित हो। एक तरफ ऐसा मन दिखाई देता है कि राम राजगद्दी छोड़कर जंगल चले जाते हैं और दूसरी तरफ दुर्योधन का मन भी है जो सुई की नोक के बराबर भी भूमि अपने भाई पांडवों को देने को तैयार नहीं है। कामनाओं के ज्वार में कोई भी आज अपनी हसरतों पर लगाम लगाना नहीं चाह रहा है और थोड़ी भी विषम परिस्थिति आने पर जीवन का महाभारत छोड़ कर या तो पलायन कर जा रहा है या आत्महत्या। अर्जुन जैसा महान योद्धा भी अवसादग्रस्त होकर महाभारत छोड़कर भागना चाहता था किंतु कृष्ण ने अनेक मार्गों( ज्ञानयोग, कर्मयोग) से उसकी काउंसलिंग की और उसे कर्मण्येवाधिकारस्ते का मंत्र दिया। अर्जुन का अवसाद(Depression) पलायन या आत्महत्या नहीं होकर आत्मक्रांति बन गया। काश! हर अर्जुन अपने कृष्ण को ढूंढने का प्रयास करे तो पलायन या आत्महत्या आत्मक्रांति में तब्दील हो सकती है।-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹