पठन्ति चतुरो वेदान् , धर्म शास्त्राण्यनेकश: , आत्मानं नैव जानंति दर्वी पाकरसं यथा।।
October 10, 2020"संवाद" मानसिक स्वास्थ्य कैसे उपलब्ध हो? -तन और आत्मा अस्तित्व का उपहार हैं किंतु मन समाज का । अतः समाज और शिक्षा जैसी होगी मन उसी रूप में ढल जाएगा। किसी धर्म, जाति, क्षेत्र,लिंग में जन्म लेना मनुष्य के वश की बात नहीं है किंतु उनके संबंध में कंपलेक्स (सुपीरियरिटी या इंफेरियरिटी) मन में बिठा दिया जाता है। फिर पूरा जीवन इसी मन के इर्द-गिर्द संचालित होता है। परस्पर विरोधी भावों और विचारों के वशीभूत हुआ मन एक दूसरे के प्रति घृणा और हिंसा पर उतारू हो जाता है। मानसिक स्वास्थ्य तब तक उपलब्ध नहीं हो सकता जब तक समाज द्वारा दिए गए पूर्वाग्रह, दुराग्रह और हठाग्रह को मन से सम्यक शिक्षा द्वारा निकाल नहीं दिया जाता। मेरो मन बड़ो हरामी संकेत देता है कि भेदभाव,व्यभिचार, भ्रष्टाचार के मूल में यह हरामी मन ही है। आत्मा मालिक हो और मन गुलाम तो फिर मन हरामी की जगह अंतर्यामी हो सकता है। अतः शिक्षा का सर्वाधिक जोर आत्मा के जागरण पर होना चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि हमारी शिक्षा से सुमन की जगह दुर्मन ही अधिक सृजित हुआ। ऋषि कहते हैं "पठन्ति चतुरो वेदान् , धर्म शास्त्राण्यनेकश: , आत्मानं नैव जानंति दर्वी पाकरसं यथा।।" -यानि सब कुछ पढ़ने के बाद भी आत्मा को नहीं जानने के कारण जीवन उस कलछी की तरह हो गया है, जिसे किसी भी चीज में रस नहीं आता। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा केवल आजीविका मात्र के लिए रह गई है और उसमें भी असफल हो रही है। सभी का लक्ष्य डॉक्टर,इंजीनियर और अफसर बनना है, जिसके लिए बहुत बड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है। इसमें जोर किताबें रटने और कोचिंग लेने पर ही सिमट कर रह गया है। शिक्षा संस्थान भी धन बनाने वाला केंद्र बन गया है फिर इंसान बनाने वाला केंद्र कहां है? _ "स्वस्मिन स्थित:" अर्थात् व्यक्ति स्वयं में स्थित हो तब जाकर व्यक्ति स्वस्थ होता है।_ आजकल मन का प्रशिक्षण ऐसा दिया जा रहा है कि वह बाहर ही भाग रहा है- धन-पद-प्रतिष्ठा हेतु। यदि वह लक्ष्य नहीं मिलता है तब विषाद और मिल जाता है तब भी विषाद।। यदि सिर्फ बाहर भागते हुए मन का मुख मोड़ कर प्रत्येक दिन थोड़ी देर के लिए अंदर में स्थित आत्मा से भी योग कराया जाए तो स्वयं से तृप्ति हो सकती है। लेकिन इसके लिए बहिर्मुखी युग में अंतर्मुखी चित्त वाले व्यक्ति का सान्निध्य चाहिए जो कि दुर्लभ है। इसी कारण से- फिर रहा है आदमी भूला हुआ भटका हुआ , एक न एक लेबल हर एक माथे पर है लटका हुआ. जब तक हर लेबल को हटाने वाली शिक्षा उपलब्ध नहीं होती तब तक मानसिक स्वास्थ्य उपलब्ध नहीं हो सकता।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹