अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस
October 11, 2020"संवाद" अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस 11 अक्टू. को मनाने के पीछे मूल उद्देश्य है कि पुरुष-प्रधान मानसिकता वाली इस दुनिया में निर्भया (बालिका) भयभीत और दोयम दर्जे की नहीं रहे। अतः 2020 की थीम अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के लिए निर्धारित की गई है- "हमारी आवाज और हमारा समान भविष्य". किंतु जिस देश में बालिकाओं के बोलने पर जीभ काट दी जाती हो, बाहर निकलने पर इज्जत लूट ली जाती हो और कभी सेक्स के लिए Killing तो कभी ऑनर के लिए Killing की शिकार हो जाती हो तो उस देश में बालिकाएं अभय कैसे हो सकती हैं? अभय के अभाव में उनकी आवाज और भविष्य कैसा हो सकता है? यदि बालिकाएं दबी,कुचली और भयभीत हैं तो उनके गर्भ से जन्म लेने वाला बालक गौरवपूर्ण और गरिमापूर्ण कैसे हो सकता है? अतः आज विचार का दिवस है कि आधी दुनिया बालिकाओं की हैं और वे ही सृष्टि को आगे बढ़ाती हैं; फिर भी पुरुष प्रधान मानसिकता के कारण कुछ गलत सोच/मान्यता/विश्वास को तो आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है। मसलन "बालिकाएं कमजोर होती हैं" यह धारणा प्रचलित है लेकिन गहराई से विचार करने पर पता चलता है कि बालक और बालिका में भिन्नता तो जरूर हैं किंतु असमानता कदापि नहीं। शारीरिक बल या मसल्स पावर में बालक जरूर कुछ ज्यादा होते हैं किंतु हार्दिक बल या रेसिस्टेंस पावर में बालिकाओं का कोई मुकाबला नहीं। आज की दुनिया में मसल्स पावर का काम तो मशीनें कर देती हैं किंतु जिस प्रेमपूर्ण हृदय से 9 महीने तक गर्भ को धारण कर, शिशु को जन्म देकर जिस ममता के साथ त्याग-तपस्या से शिशु को मां पालती हैं ,उस काम को दुनिया में कोई मशीन नहीं कर सकती। कोरोना के काल में छोटी बालिका ज्योति अपने बीमार पिता को साइकिल पर पीछे बिठाकर हरियाणा से बिहार तक 1200 किलोमीटर की यात्रा अकेले अपने दम पर पूरी करती हैं, क्या यह पर्याप्त प्रमाण नहीं है कि किसी भी क्षेत्र में बालिकाएं बालकों से कमजोर नहीं है। मलाला आतंकियों की गोली खा कर के भी अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ती हैं और ग्रेटा पर्यावरण के मुद्दे पर विश्व के बड़े-बड़े राष्ट्राध्यक्षों की आवाज को फीकी कर देती हैं। जहां पर भी बालिकाओं को समान परवरिश और समान शिक्षा दी जाती हैं, वहां पर बालकों की तुलना में उनका बेहतर प्रदर्शन रहा है। यदि इस दुनिया को बेहतर और आनंद से पूर्ण बनाना है तो सिर्फ मस्तिष्क-प्रधान पुरुष की आवाज से काम नहीं चलेगा, उसके साथ हृदय-प्रधान स्त्री की आवाज का मार्गदर्शन भी प्राप्त करना होगा। पौरुष बल का प्रदर्शन करने वाले पुरुष को यदि परमात्मा बच्चे को जन्म देने और पालने का काम दे दे तो सारे पुरुष को पता चल जाएगा कि यह काम उनके लिए कठिन ही नहीं असंभव है। "हे परमात्मा! तू एक नई सृष्टि ईजाद कर दे , पुरुष को गर्भ दे दे और स्त्री को आजाद कर दे"- यह कविता शाम को लिखकर मैं सोने गया तो रात में ही नींद खुल गई कि कहीं परमात्मा ने यह बात सुन ली तो यह जीवन मेरे लिए कितना दुष्कर हो जाएगा। उस दुष्कर और कठिनतम कार्य को बालिकाएं प्रेम और आनंद के साथ करती हैं; अतः उनके प्रति पुरुष सोच को बदलने के लिए यह दिवस प्रेरित करता है।-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹