'संवाद'" सोच बदलने की दरकार "-नवरात्रि चल रही है जिसमें कन्या और देवी के सर्व भूतों में विभिन्न रूपों में विद्यमान होने के मंत्र गुंजायमान हो रहे हैं- या देवी सर्वभूतेषु विद्या,शक्ति,लक्ष्मी.. रूपेण संस्थिता,नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। किंतु जिंदा रूप में आई हुई कन्याओं या देवियों के लिए दुनिया बहुत डरावनी है। भारत में स्त्री के लिए जगह यत्र नार्यस्तु पूज्यंते की सैद्धांतिक ऊंचाई से लेकर जिमी स्वतंत्र होहिं बिगरहिं नारी के व्यावहारिक धरातल के बीच झूलती रही है। अतियों में जीने वाला मन या तो उसे पूजा के योग्य मानता है या दासता के। नारी सशक्तिकरण आंदोलन का सारा जोर समकक्षता को लेकर है। पुरुष प्रधान समाज सामंती व्यवस्था से निकला तो पूंजीवादी व्यवस्था के दलदल में फंस गया है। इन दोनों ही व्यवस्थाओं में नारी का अस्तित्व वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं है। एक तरफ सामंती व्यवस्था काल के युद्ध में धन के साथ स्त्री का भी अपहरण किया जाता था तो दूसरी तरफ पूंजीवादी व्यवस्था में वस्तु को बेचने के लिए वस्तु के समान स्त्री का उपयोग किया जाता है। आध्यात्मिक समाज में ऋषियों की दिव्य-दृष्टि स्त्री के विभिन्न रूपों को पूजा योग्य मानती है किंतु व्यवहार में अधिकतर लोगों की दृष्टि नारी को दासी-योग्य और भोग्या ही मानती हैं। ऋषि-दृष्टि और जनसाधारण की दृष्टि में भारी अंतर है। सम्यक और स्वस्थ दृष्टि तो यह होगी कि पुरुष और स्त्री एक दूसरे के परिपूरक बनें और दोनों के बीच एक स्वस्थ मैत्री भाव विकसित हो। इसके लिए पुरुष को सर्वप्रथम अपने कुछ विशेषाधिकारों को स्वत: ही छोड़ने को तैयार होना पड़ेगा और स्त्री की नई भूमिका में अपना सकारात्मक सहयोग देना पड़ेगा। सोच बदले बिना यह संभव नहीं है।मसलन बलात्कार के लिए शीलभंग शब्द का प्रयोग होता है। किंतु विचारणीय प्रश्न यह है कि शील किसका भंग हुआ? सिर्फ स्त्री से ही यौन पवित्रता की मांग बलात्कार को एक भयावह घटना बना देती हैं। माहौल को कामुक बनाने में और अश्लीलता फैलाने में स्त्रियों का वस्तु की तरह उपयोग किया जाता है। इसमें सक्षम स्त्रियों का योगदान ज्यादा है किंतु इसका कहर कमजोर स्त्रियों पर टूटता है। बलात्कार में यौन-उत्तेजना ही एक पक्ष नहीं है बल्कि इसके साथ हिंसक वृत्ति भी जुड़ी हुई है। नवरात्रि एक शुभ-अवसर है जिसमें यौन शुचिता के दोहरे मापदंड को तोड़ने और अहिंसक समाज की रचना करने हेतु विशेष चिंतन-मनन होना चाहिए।-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे दुर्गाष्टमी की शुभकामनाओं सहित🙏🌹