'संवाद' पर्वों पर कोरोना के नकारात्मक असर से विजयादशमी के सकारात्मक असर तक- राष्ट्रीय पर्व हो या धार्मिक पर्व मानव के जीवन में उल्लास और उमंग भर देते हैं। काम के बोझ से दबा इंसान अति व्यस्तता के कारण नीरसता का शिकार होता चला जाता है। उसके मन में भाव उठते हैं- न कोई उमंग है, न कोई तरंग है ; मेरी जिंदगी भी क्या एक कटी पतंग है। कटी पतंग को सामाजिक मिलन और स्नेह की एक मजबूत डोर मिल जाती हैं। चुंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अतः स्वाभाविक रूपेण वह पर्व या त्यौहार के अवसरों पर अपने सगे-संबंधियों से मिलकर अपनी खुशी को दुगुना कर लेता है और गम को आधा - "चांद को देखा है जमीं से बहुत , जमीं को चांद पर से देखा है ; हंसीं है वादियों का अंधेरा भी , यह रोशनी के शिखर से देखा है।" - इन पंक्तियों का भाव यह है कि जमीन पर से चांद खूबसूरत लगता है किंतु चांद पर से जमीन उससे भी ज्यादा खूबसूरत नजर आती है क्योंकि यहां पर बस्तियां हैं। होली के समय पर कोरोना ने दस्तक दी थी। तब एक दूसरे को रंग में रंगने के अरमान को रोक देना पड़ा था जबकि " होली के दिन दिल खिल जाते हैं , रंगों में रंग मिल जाते हैं।" किंतु इस वायरस के कारण होली बेरंग हो गई। फिर ईद का पर्व आया और उसमें भी समूह में नमाज पढ़ने के बाद एक दूसरे को गले लगाने के अरमान धरे के धरे रह गए। महामारी के नियम इतने सख्त हैं कि लोगों के रोजगार तक पर बहुत बुरा असर पड़ा है। अभी केरल में ओणम का त्यौहार धूमधाम से मनाया गया जिसके कारण कोरोना का प्रकोप फिर से लौट आया। इस महामारी के दहशत के कारण नवरात्रि में होने वाला गरबा आयोजित न हो सका। मेलों का आयोजन न हो पाने से लाखों परिवारों पर आजीविका का संकट गहरा हो गया। निश्चित रूप से सामाजिक मेलजोल के न होने से जीवन में एक बहुत भारी कमी अखर रही है और त्यौहारों का सामूहिक कर्मकांड पक्ष सूना पड़ गया।। किंतु सब कुछ नकारात्मक ही नकारात्मक है ,ऐसी बात नहीं है। जो मन दूसरों से मिल नहीं पाया वह स्वयं पर लौट आया- जैसे उड़ी जहाज को पंछी फिर जहाज पर आयो. जन सामान्य की आदत दूसरों में खुशी ढूंढने की पड़ गई थी, वह खुशी अब अपने आप में ढूंढनी पड़ रही हैं। त्यौहार के एकांतिक साधना का पक्ष सृजनात्मक और कलात्मक बना है। कस्तूरी कुंडली बसै , मृग ढूंढै बन माहि वाला स्वभाव अब परिवर्तित हो रहा है। इकबाल के शब्दों में- मंजिलें गम से तो गुजरना है आसान इकबाल , जिंदगी है नाम खुद से गुजर जाने का- इसके लिए कोरोना ने एक अवसर दिया है। एक समय हिंदुस्तान पर जब बाहरी आक्रमण हो रहे थे तो लोगों ने गुफाओं में और एकांत जगहों पर बैठकर भक्ति के नए-नए गीत गाए और पत्थरों में सुंदर से सुंदरतम चित्र उकेरे। इस काल में भी जिनके पास संसाधन थे उन्होंने त्यौहारों को नए गीतों ,नए चित्र के माध्यम से सृजनात्मक और कलात्मक ऊंचाईयां दी हैं। आज विजयादशमी के अवसर पर भारी भीड़ रावण को जलते हुए नहीं देख सकती हैं किंतु प्रत्येक व्यक्ति अपने अंदर में काम,क्रोध,लोभ,मोह रूपी रावण को देख भी सकता है और उसे जलाने का प्रयत्न भी कर सकता है ताकि प्रेम और करुणा रूपी रामत्व प्रकट हो सके। रावण की मैं बाहें काटूँ या लंका में आग लगाऊं , घर- घर रावण, घर-घर लंका , इतने राम कहां से लाऊं?? - इतने राम प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंदर में आविष्कृत करना होगा।। अपनी दसों इंद्रियों पर विजय प्राप्त करके दशरथ पुत्र राम की तरह रामत्व की खोज में यदि निकल सकें तो महामारी का काल अभिशाप की जगह वरदान भी बन सकता है और विजयादशमी हर एक के जीवन में सही मायने में उतर सकता है।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे विजयादशमी की शुभकामनाओं के साथ 🙏🌹