जिन दुखों से भागकर पुरुष बुद्ध कहलाते हैं , उनसे गहन दुखों में भी हम मुस्कुराते हैं
October 24, 2020'संवाद' निर्ममता की हद- वह सीधा था,शांत था। कभी किसी ने उसे आक्रामक रूप में नहीं देखा। उसकी 37 वर्षीय पत्नी नीतू भी मेहनती और मिलनसार थी। कभी पति-पत्नी के बीच झगड़ा होते भी नहीं देखा। 15 वर्ष की बेटी श्वेता और 13 वर्ष का बेटा आर्यन से भरा पूरा परिवार था। मकान मालिक और पड़ोसी देवेंद्र के बारे में यही बता रहे थे। फिर क्या हुआ कि देवेंद्र ने अपनी पत्नी और बच्चों की रात के 2:00 बजे इतनी निर्ममता से हत्या कर दी कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों ने भी अपने पिछले 25 सालों के अनुभव में ऐसा नृशंस केस नहीं देखा था। और हत्या करने के बाद सीसीटीवी कैमरे में वह शांति के साथ बाहर निकलते हुए पाया गया। बांसवाड़ा में हुई इस दिल दहलाने वाली घटना के बारे में जब पत्नी ने मुझे 23.10. 20 को बताया और कहा कि पुलिस उसे ढूंढ रही है तो मेरे मुख से अचानक निकला कि वह आत्महत्या कर लेगा। आज सुबह जब पेपर खोला तो उसके आत्महत्या की खबर पहले पृष्ठ पर थी। पूरा शहर सन्नऔर स्तब्ध है तब जबकि दुर्गा पूजा और दशहरा महामारी के काल में आशा और उत्साह जगाने को दरवाजे पर खड़े है। पत्नी ने पेपर पढ़ने के बाद पूछा कि आपने किस आधार पर भविष्यवाणी की थी जो सच निकली। मैंने कहा कि मैं कोई ज्योतिष विद्या का जानकार या भविष्यवक्ता नहीं हूं किंतु हृदय से यह आवाज आई कि अहंकारवश जब व्यक्ति क्रोध में आकर कोई जघन्य कृत्य कर बैठता है तो कुछ देर बाद उसकी आत्मा धिक्कारने लगती है। जब स्वयं की आत्मा स्वयं को ही माफ करने को तैयार नहीं है तो आत्महत्या के अलावा और क्या चारा बचता है? जब हत्यारे ने आत्महत्या कर ली तो पुलिस विभाग के पास आगे की जांच हेतु कुछ विशेष नहीं बचता किंतु शिक्षा विभाग के लिए मनोविश्लेषण हेतु बहुत कुछ केस में छुपा हुआ है। एक ऐसी ही दिल दहलाने वाली घटना आज से 30 वर्ष पूर्व पटना में घटी थी और उस व्यक्ति को मैंने व्यक्तिगत रूप से 4 साल उसके मकान में रह कर देखा था। बहुत शांत और मितभाषी नमो भैया को अड़ोस-पड़ोस सभी पसंद करते थे। अचानक एक दिन सभी समाचारपत्रों के प्रथम पृष्ठ पर उस नमो भैया की फांसी के फंदे पर लटकी तस्वीर छपी देखी,जिसने अपनी तीन बेटियों की गला दबाने के बाद अपने कमर में बांध कर आत्महत्या की थी। क्योंकि उसी मकान में मैं रह चुका था और पूरे परिवार को अच्छी तरह से जानता था, अतः आत्महत्या का कोई कारण नहीं सोच पा रहा था। किंतु पुलिस तहकीकात के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि अच्छी चलने वाली गृहस्थी में अचानक पत्नी चल बसी तो तीनों बेटियों के लालन-पालन में जिस धैर्य और सहनशीलता की आवश्यकता थी, वह उसके पास नहीं थी। अतः परेशान होकर एक रात उसने बारी-बारी से आधे-आधे घंटे के अंतराल पर सोती हुई बेटियों में से एक-एक का गला दबाया और प्रत्येक बेटी को मारने के बाद लंबा-चौड़ा खत लिखा। इस तरह 3 खत लिखने के साथ3 बेटियों की गला दबाकर हत्या और अंत में उन्हें अपने कमर(waist) में बांध कर स्वयं को फंदे से लटकाने का काम उसने किया। कई दिनों तक मुझे नींद नहीं आई और आज तक मैं सोचता हूं कि विधुर होने के बाद पुरुष अकेले नहीं रह पाता और बच्चों को पाल नहीं पाता लेकिन विधवा होने के बाद स्त्री पति की हर एक स्मृति को संजोते हुए पल-पल संघर्ष करते हुए तिनके- तिनके जोड़कर घर को बसा लेती हैं तथा चला लेती हैं। "जिन दुखों से भागकर पुरुष बुद्ध कहलाते हैं , उनसे गहन दुखों में भी हम मुस्कुराते हैं" - मेरे हृदय से निकली चंद पंक्तियां जीवन के बहुत बड़े सत्य को उद्घाटित कर रही हैं क्योंकि परमात्मा ने स्त्रियों के जीवन मे एक गहराई दी है और उसे ही सृष्टि का माध्यम बनाया है। बुद्ध को पैदा करने वाली स्त्री कभी बुद्ध बनने की ख्वाहिश भी नहीं रखती-" बुद्ध बनने की कोई ख्वाहिश नहीं है , साधना की कहीं कोई नुमाईश नहीं है। " संसार से भागकर और जंगल में जाकर बुद्ध ने 6 वर्ष की तपस्या की और महावीर ने 12 वर्ष की तपस्या की,फिर ज्ञान को प्राप्त हुए जिसे पूरी दुनिया जानती हैं। किंतु संसार में रहकर और पुरुष प्रधान समाज के बीच डटकर स्त्री आजीवन तपस्या करती हैं लेकिन दुर्भाग्य है कि न तो दुनिया जानती है और न स्त्रियों के ज्ञानप्राप्ति की बात भी चलाती हैं। स्त्रियों को दुनिया को जनाने का या ज्ञान प्राप्ति की घोषणा का कभी ख्याल भी नहीं उठता। ऐसा क्यूँ? शायद सृजनशीला और ममतापूर्णा होने के कारण सिद्धिदात्री स्वयं(आत्मा) से स्वयं (आत्मा) में ही तृप्त है। अफसोस तो यह है कि ममतामयी की दुनिया में निर्ममता की ऐसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹