'संवाद' हे बिहार! कोरोना-काल में अव्यवस्था का दंश तूने जो झेला और पलायन की पीड़ा को जो भोगा, उसे देखकर यही लगता था कि राजनीति से वितृष्णा हो जाएगी। किंतु चुनावी रैलियों में महामारी के इस पीक काल में प्रजा और राजा के इस उत्साह को देखकर मैं हैरान हूं। अपनी जिज्ञासा और कौतूहल को शांत करने के लिए सोचा कि कुछ प्रश्न पूछ लूं-(१) महावीर और बुद्ध की धरती पर बुद्धुओं की विचार-प्रणाली और आचार-प्रणाली ने कैसे और कहां से जड़ें जमा ली?(२)अपनी समस्त मानव संपदा को तुमने बाहर पलायन को क्यूँ मजबूर कर दिया?(३) जिस धरती पर शिक्षा का केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय कभी रहा हो और राजनीति का केंद्र मगध साम्राज्य रहा हो, उस धरती की शिक्षा व्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था दोनों हास्यास्पद कैसे बनी? एक बार मैं राजस्थानी शिक्षाविद् के साथ बिहार अपने गांव गया तो बड़े-बड़े वृक्ष, उर्वर धरती और पानी की सर्वत्र उपलब्धता को देखकर वे विस्मय-विमुग्ध हो गईं। उन्होंने एक प्रश्न पूछा कि राजस्थान की धरती का दो तिहाई भाग मरुस्थल, नदियों के जाल की भारी कमी और बॉर्डर इलाका होने के कारण सारे झंझावात; इसके बावजूद राजस्थान ने इतना विकास कर लिया किंतु बिहार में सब कुछ होने के बावजूद इतनी गरीबी,अशिक्षा और अव्यवस्था क्यूँ? तब से आज तक मैं उनके प्रश्नों पर दिन-रात विचार कर रहा हूं। समृद्ध सांस्कृतिक-परंपरा व राजनीतिक- परंपरा वाली उर्वर धरती के साथ जल एवं खनिज संपदा की प्रचुरता के बावजूद कुछ गलत नेतृत्व ने धनी बिहार को निर्धन बना रखा है। जनता की गलत सोच ने भी हरी- भरी धरती को वीरान बना दिया है। उन गलत सोचों में से सबसे बड़ी गलत सोच मुझे यह लगती है कि बड़ी-बड़ी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो करके यहां की प्रतिभाएं अपना सारा योगदान बाहर के प्रदेशों में कर रही हैं। जब अच्छे और प्रतिभाशाली लोग अपनी धरती की राजनीति से मुंह मोड़ लेते हैं तो बुरे और प्रतिभाहीन लोग जाति-धर्म के आधार पर बंटे हुए समाज की कमान संभाल लेते हैं। इस बार के चुनाव की आबोहवा रोजगार,शिक्षा और पलायन के मुद्दों की प्रमुखता के कारण सबको बदली हुई सी लग रही है। किंतु दुख इस बात का है कि भारत रत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद और संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण की धरती पर बहुत बड़े प्रतिभाशाली नेतृत्व के उभरने के आसार नहीं दिखाई दे रहे। इस चुनाव में भी अपराधिक छवि वाले उम्मीदवार इतनी ज्यादा संख्या में है कि उनको देखकर नहीं लगता कि रोजगार, शिक्षा और विकास के मुद्दे पर कोई सरकार काम कर पाएगी। राजनीति ने अपनी फितरत ऐसी बना ली है कि प्रतिभाशाली और योग्यतम नेतृत्व को अपनी तरफ आकर्षित ही नहीं कर पाती। गणतंत्र जब तक गुणतंत्र बनने की परिस्थिति और मन:स्थिति नहीं निर्मित करता तब तक शिक्षा और स्वास्थ्य की उपेक्षा के कारण विकास उपेक्षित बना रहेगा ; ऐसे में विकास की बात तो खूब होगी किंतु वास्तविक विकास कहीं भी नहीं दिखेगा। "यथा राजा तथा प्रजा" की पुरानी कहावत अब समझ नहीं आती क्योंकि यहां राजा और प्रजा में से कौन किसको प्रेरित कर रहा है यह समझ में नहीं आ रहा। -'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹