'संवाद' भावनात्मक एकता- भारत की बगिया में खिले भिन्न-भिन्न रंग और आकार के फूलों में विविधता है जो स्पष्ट रूप से दिखाई देती है किंतु उसमें छुपी एकता भी है जो साफ तौर पर दिखती नहीं है। यह जीवन का अद्भुत विरोधाभास है कि दिखाई देने वाली चीज से भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं दिखाई देने वाली चीज हो जाती है। शरीर दिखाई देता है किंतु आत्मा दिखाई नहीं देती। लेकिन शरीर से ज्यादा महत्वपूर्ण आत्मा है। ओशो अपने संबोधन में मेरे प्रिय आत्मन् शब्द का प्रयोग करते थे। आप किसी को मेरे प्रिय तन संबोधन से पुकारें तो उसे बहुत बुरा लगेगा। यह तन तो किसी जाति,धर्म,क्षेत्र,लिंग का लेबल लगाने को बाध्य है किंतु आत्मा की कोई बाध्यता नहीं है। तन के तल पर विविधता सत्य है लेकिन आत्मा के तल पर एकता ही सत्य है। जब मैं खेल जगत में था तो अपने क्लब टीम के प्रति भाव से भरा हुआ था। अपनी टीम के हारने पर गम होता था और जीतने पर खुशी। किंतु जब डिस्ट्रिक्ट टीम में सेलेक्शन हो गया तो उन्हीं प्रतिद्वंदी साथियों के साथ एक जिला टीम का भाव विकसित हो गया। फिर जब राज्य स्तर पर चयन हुआ तो जिला टीम का भाव गौण हो गया। इसी प्रकार से जब भारत का मैच होता है तो भारतीयता का भाव रोम-रोम में भर जाता है। यह ध्यान ही नहीं रहता कि कौन किस राज्य का खिलाड़ी है। तब मुझे जीवन के इस अद्भुत सूत्र का एहसास हुआ कि राष्ट्रीय एकता के लिए तल बदल कर उंचाई पर जाने की जरूरत है। ऊंचाई पर जाने पर निम्न तल की पहचान मिट नहीं जाती है,बस गौण हो जाती है। तब पश्चिमी छोर के(गुजरात के) गांधी को उत्तर,दक्षिण और पूर्वी छोर हृदय की गहराइयों से राष्ट्रपिता श्रद्धापूर्वक मानते हैं। दक्षिण के शंकराचार्य उत्तर में हिमालय पर जाकर मठ की स्थापना करते हैं। उत्तर-पूर्व के विवेकानंद कन्याकुमारी के तट पर शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में जाने हेतु अपने गुरु के संदेश को प्राप्त करते हैं। रामेश्वरम के तट से शिक्षा प्राप्त कलाम साहब शिलांग में शिक्षा देते हुए अपनी अंतिम सांस लेते हैं। विश्व की सबसे ऊंची स्टैच्यू ऑफ यूनिटी तो हमने लौह पुरुष सरदार पटेल की याद में बना दी किंतु उनके हृदय के विराट और उदार भाव को अपने हृदय में पूर्णरूपेण नहीं उतारा। सरदार पटेल के कहने पर रियासतों के राजा अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में समर्पित करने को राजी हो गए और राजनीतिक एकता का यज्ञ पूर्ण हुआ। इसी यज्ञ की पूर्णाहुति के लिए आयरन लेडी इंदिरा गांधी जी ने भी अपनी शहादत दी। आज हमारी जिम्मेदारी है कि अपनी साझी सांस्कृतिक विरासत को समझेंं और भावनात्मक एकता को मजबूत बनाएं।" सं वो मनांसि जानताम् " द्वारा ऋषि यह संदेश देते हैं कि हमारे मन एक हों - ये माना आदमी में फूल जैसे रंग है लेकिन, मगर तहजीब की खुशबू मोहब्बत ही से आती है। -'शिष्य-गुरु संवाद' के डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹