'संवाद' "उच्च शिक्षा संस्थानों में आनंदम प्रारंभ" :- विद्यार्थी का प्रश्न - हमारे पास क्या है जिसको देकर हम "जॉय ऑफ गिविंग" का अनुभव करें? प्रिय विद्यार्थी! कॉलेज शिक्षा में "आनंदम" नामक नूतन एवं अनूठा प्रयोग आपकी चेतना में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से लाया गया है। संभवत: शिक्षाविदों की यह सोच है कि देने का भाव हृदय को विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण है जिसे अगली पीढ़ी में जागृत किया जाना चाहिए। यदि हृदय देने के भाव से भर जाए तो आंखों को देने योग्य बहुत सारी चीजें दिखाई देने लगती हैं। जब मजदूर सड़कों पर अपने गांव पैदल लौट रहे थे तो कोरोना के आतंक के बावजूद बहुत गरीब ग्रामीण और किसान लोगों ने अपने खेतों में उगे अन्न और सब्जियां लाकर भोजन बनाए और अपरिचित भूखे-पीड़ितों को खिलाया। कुछ दंपतियों ने अपनी जिंदगी भर की पेंशन की कमाई भूखे-प्यासे लौटते मजदूरों को खिलाने में लगा दी। सामाजिक सुरक्षा का इतना बड़ा सफल अभियान इस संकट काल में सामने आया। लोगों ने खुलकर दान दिए और नौजवानों ने घर-घर खाने के पैकेट पहुंचाएं और अन्य कई रूपों में अपनी सेवा दी। 100 अंक के आनंदम विषय को कॉलेज के खुलने तक ऑनलाइन चलाया जाएगा। इस आदेश की पालना में 8-12 का समूह बनाकर आप अपने परिवेश में सामाजिक सेवा का कोई भी रचनात्मक कार्य कर सकते हैं। अच्छे कार्य को रजिस्टर में नोट करना है और उसके फोटो इत्यादि प्रमाण भी रखने हैं। प्रत्येक माह के अंतिम सप्ताह में आनंदम दिवस के दिन उसे प्रस्तुत करना है ताकि आपको अच्छे अंक मिल सके और दूसरे को प्रेरणा भी प्राप्त हो सके। इन सारी गतिविधियों को करते समय मास्क पहनना और सामाजिक दूरी बनाए रखना जरूरी है। ज्योति नामक 15 साल की बच्ची ने हरियाणा से बिहार तक 12 सौ किलोमीटर की यात्रा साइकिल से अपने बीमार पिता को पिछली सीट पर बैठा कर की। यह एक जिंदा उदाहरण पर्याप्त है कि यदि हृदय में प्रेम और दान का भाव भर जाए तो नई पीढ़ी का चरित्र महान बन जाए। कॉलेज के विद्यार्थियों को देने के लिए तो पास मेँ बहुत बड़ी अमूल्य निधि है-" अन्न दानं महादानं , विद्यादानं महतरम् अर्थात् अन्नदान तो महान है किंतु विद्यादान तो उससे भी महान है क्योंकि अन्नेन क्षणिका तृप्ति:, यावज्जीवं तु विद्यया यानी अन्न से तो क्षणिक तृप्ति होती है, विद्यादान से तो जीवन भर। अतः विद्यार्थियों से मेरी अपील है कि जनजागरूकता का बड़ा अभियान चलाने का अवसर हमारे सामने है। हम शिक्षा की अलख जगा सकते हैं, वृक्षारोपण का अभियान हर जगह चला सकते हैं, पटाखों के कारण होने वाले प्रदूषण के बारे में समाज को जगा सकते हैं और महामारी से बचाव के लिए नई जीवनशैली को लोगों को समझा सकते हैं। ख्वाहिश हो तो काम बहुत है , जीवन के पैगाम बहुत हैं - यदि विद्यार्थी एक बार आनंदम विषय को जीवन में उतारने के लिए हृदय से संकल्पित हो जाएं तो यह संकट हमारे लिए अवसर बन सकता है। देने के आनंद को यदि एक बार आप अनुभव कर लें तो आप समझ सकेंगे कि क्यों नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी ICS की नौकरी देश की सेवा के लिए छोड़ दी और क्यों लाखों युवा स्वामी विवेकानंद की आवाज पर दीन-दुखियों की सेवा के लिए सारे सुखों का त्याग कर दिए। आज के भोग-प्रधान जीवन में भारतीय संस्कृति के त्याग-प्रधान आदर्श को पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए आनंदम विषय को कॉलेज शिक्षा में अनिवार्य बनाया गया है। उपनिषदों की घोषणा है कि त्याग से ही अमृत तत्व की प्राप्ति होती हैं- "त्यागेनैके अमृतत्वमानशु:" .- डॉ. सर्वजीत दुबे,प्राचार्य,हरिदेव जोशी राजकीय कन्या महाविद्यालय बांसवाड़ा🙏🌹