'संवाद' बिहार चुनाव के संदर्भ में एग्जिट पोल के अनुमान जब धाराशायी हो गए तो मेरे जैसे अराजनीतिक-प्रकृति वाले व्यक्ति की सोच क्या मायने रखती है? लेकिन एक प्रजा की सोच भी प्रजातंत्र में मायने रखती है,यही इसकी खूबसूरती है। 10लाख सरकारी नौकरी का वादा युवा बेरोजगारों के लिए उस सोने के कंगन के समान था, जिसके लोभ मेँ पंडित भी आने से अपने आप को न रोक सका था। एक सरकारी नौकरी से कई परिजनों की जिंदगी को स्थायी सहारे की गुड फीलिंग होने लगती हैं। अतः लोगों का सरकारी नौकरी के वादे वाली सभाओं में उमड़ पड़ना बहुत स्वाभाविक था। लेकिन विपक्षी पार्टियों ने जंगलराज की याद दिला कर जनता के मन में अविश्वास पैदा कर दिया। जनता भी सोचने लगी कि जंगल राज के युवराज के हाथ में दिख रहे सोने के कंगन को लेने के चक्कर में कहीं जान आफत में न पड़ जाए- "युग-युग तक परिवार से कीमत करे वसूल , कभी किसी एक मोड़ पर किसी एक की भूल". पार्टियां एक-दूसरे पर चुनाव के समय में जितने भी गंभीर आरोप लगाती हैं, उनमें से अधिकांश बाद में झूठे निकलते हैं लेकिन उसका तात्कालिक असर बहुत ज्यादा होता है। सुशासन बाबू को इतना श्रेय तो जाता ही है कि लड़कियां घरों से बाहर निकलने लगीं और सुरक्षित घर लौटने लगीं। किंतु आज जनता को सुशासन के साथ रोजगार और विकास भी चाहिए। अतः मेरी नजर में कांटे की इस लड़ाई में कोई भी पार्टी नहीं जीती हैं। जीत तो मुद्दे की हुई है। शक्तिशाली विपक्ष सत्तापक्ष को सदैव जनहित के मुद्दे पर घेरेगा और सत्तापक्ष सदैव जनमत को अपने पक्ष में बनाए रखने का प्रयास करेगा। इससे प्रजातंत्र और अधिक मजबूत होगा। आज सरकार में होना बहुत ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। खासकर जब विपक्ष मजबूत हो तो उसके उठाएं प्रश्नों का जवाब देना सरकारों के लिए मुश्किल हो रहा है। 1000000 सरकारी नौकरियों को देने के लिए परीक्षा लेने वाली व्यवस्था बहुत दुरुस्त चाहिए जिसकी आधारभूत कोई तैयारी नहीं है। अप्रवासी मजदूरों के घर लौट आने से उनके रोजगार का सृजन भी सरकार की जिम्मेदारी बनती हैं। अतः बिहार का ताज कांटो भरा ताज ही नहीं है बल्कि समस्याएं इतनी विकराल हो चुकी हैं कि कांटे कील का रूप ले चुके हैं। जाति और धर्म के नाम पर जीतने वाली छोटी- छोटी पार्टियों की वफादारी को परिभाषित कर पाना मुश्किल है। ऐसे में आशंका है कि रोजगार और विकास की आस में बैठी जनता को आया राम गया राम का संभावित नाटक देखने को न मिलने लगे क्योंकि - " सियासत इस कदर अवाम पर एहसान करती है , पहले आंखें छीन लेती है फिर चश्में दान करती है". - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹