'संवाद' विश्व दर्शन दिवस वर्ष 2002 से यूनेस्को द्वारा नवंबर महीने के तीसरे गुरुवार को या 15 नवंबर को मनाना प्रारंभ किया गया। मूल उद्देश्य है- दर्शन की जो विरासत रही है उसे साझा कर सत्यं शिवं सुंदरम् की ओर जगत को ले जाना। यदि आंखें पूर्वाग्रह,दुराग्रह और हठाग्रह से युक्त हो तो सम्यक-दर्शन का अभाव हो जाएगा। फिर लिया गया निर्णय विनाशकारी साबित होगा। अतः भारतीय संस्कृति में राजा अपना कुलगुरू रखता था जिससे पूछ कर कोई निर्णय लिया करता था। राजा के पास शक्ति होती थी और गुरु के पास शांति होती थी। शांति की छांव में लिया गया कोई भी निर्णय शक्ति को सम्यक दिशा दे देता था। विश्व की अधिकांश समस्याओं के मूल में शांति और शक्ति के सामंजस्य का टूट जाना है। आज राष्ट्रपति ट्रंप अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं है और आशंका है कि सम्यक दर्शन के अभाव में अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर वे अमेरिका तथा विश्व को मुसीबत में डाल सकते हैं। इसके पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन ने पर्याप्त कारण के बिना हिरोशिमा,नागासाकी पर एटम बम गिराने का निर्णय लिया था और विश्व ने महाविनाश को देखा। वॉटरगेट कांड के बाद जब अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़ा तो अपने संस्मरण में उन्होंने लिखा कि एक बार ऐसा विचार आया कि क्यों न वर्ल्ड वार छेड़कर अपने साथ सारी दुनिया को नष्ट कर दूं? लेकिन उन्होंने संयम बनाए रखा। आज यदि किसी संकुचित दृष्टि के कारण ट्रंप का संयम टूट जाए तो कल्पना नहीं कर सकते कि कितनी बड़ी हानि सबको उठानी पड़ेगी। आज हर तंत्र में कोई भी किसी भी कीमत पर सत्ता और शक्ति को प्राप्त करना चाहता है और मिल जाने पर अपनी सत्ता-शक्ति को छोड़ना नहीं चाहता क्योंकि दर्शन गलत हो गया है।। इस वक्त विश्व को एक ऐसे व्यापक और विराट दर्शन की आवश्यकता है जिसमें सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय की भावना हो। प्लेटो ने इसीलिए दार्शनिक राजा की अवधारणा दी। किंतु आज राजा और राज्य के लिए दर्शन सबसे उपेक्षित विषय है। भारतीय संस्कृति का यह सबसे महत्वपूर्ण और प्रथम विषय दर्शन स्कूलों में तो पढ़ाया ही नहीं जाता है और कॉलेजों में इसके प्राध्यापकों की संख्या बहुत कम है। जब हम विश्व की विभिन्न दृष्टियों पर चिंतन-मनन नहीं करेंगे तो सम्यक दर्शन का कैसे प्रादुर्भाव हो पाएगा? विषय कोई भी हो उसकी सर्वोच्च उपाधि पीएचडी दी जाती है जिसका अर्थ है डॉक्टरेट इन फिलॉसफीविश्व दर्शन दिवस एक अवसर देता है कि मानव अपने जीवन की दृष्टि पर चिंतन-मनन करे। प्रकृति को नष्ट करके विकास का जो रास्ता हमने चुना है उसके मूल में भी एक दर्शन है। अब जरूरत है एक ऐसे दर्शन की जो प्रकृति का संरक्षण भी करे तथा संस्कृति का संवर्धन भी करे ताकि मा कश्चित् दुख भाग भवेत् का उद्देश्य साकार हो सके। सम्यक दर्शन के कारण राम की सत्ता माध्यम बन गई सेवा का। सम्यक-दर्शन के अभाव में - "सियासत को लहू पीने की लत है , वरना विश्व में सब खैरियत है।" - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹