'संवाद' हृदय-परिवर्तन- कोरोना पॉजिटिव आने पर 70 वर्षीय कीर्ति सिंह हॉस्पिटल के बेड पर पड़े- पड़े अपनी बेटी कोमल को याद कर रहे थे। पांच संतानों में सबसे बड़ी बेटी कोमल सबसे सुंदर और सबसे अधिक प्रतिभा संपन्न थी। उस समय उस इलाके में बिजली वगैरह की समुचित व्यवस्था नहीं थी किंतु पढ़ने मेँ ऐसी जुनूनी थी कि साहित्य की कोई भी किताब रात भर जगकर लालटेन की रोशनी में समाप्त करके ही चैन लेती थी। अपनी क्लास में अव्वल आने पर जब पिता को अपना रिजल्ट बताती थी तो एक तरफ पिता को गर्व की अनुभूति होती थी और दूसरी तरफ चिंता होती थी कि बड़े विश्वविद्यालय में इसका प्रवेश हो गया तो समय पर शादी-विवाह नहीं करा पाऊंगा। ज्येष्ठानुक्रम के सिद्धांत के चलते ऐसे में संयुक्त परिवार में दूसरे बच्चों के भी रिश्ते में देर होने से अड़चनें आने लगेगी।। उस इलाके में लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती थी। जब कॉलेज के प्रथम वर्ष में ही कोमल पर शादी का दबाव पड़ने लगा तो उसे यह दुनिया अजीब सी लगने लगी। जो पिता बहुत प्यार करते थे, वे धीमे-धीमे कठोर होते जा रहे थे। और रिश्ते-नाते के लोग भी पढ़ाई पर चर्चा कम और शादी की चर्चा ज्यादा करते थे। अचानक कोमल अपने स्वभाव के विपरीत कठोर हृदय से कठोर निर्णय कर बैठी। बिना बताए वह घर छोड़कर पीजी में एडमिशन हेतु विश्वविद्यालय को निकल पड़ी। अब पिता का हृदय बहुत कठोर हो चुका था। उन्हें अपने जातिगत आन- बान-शान के नशे में यह पता ही नहीं चला कि वे रक्षा में हत्या कर रहे हैं। इधर कोमल की भी जिद इस हद तक बढ़ गई कि उसने शादी नहीं करने का ऐलान कर दिया- "जब किसी जाति का अहम् चोट खाता है , पावक प्रचंड होकर वह बाहर आता है।" हार-थक करके पिता को अन्य बच्चों के शादी-विवाह पर ध्यान देना पड़ा। यह समाज भी गजब है। जो शिक्षा की बुलंदियां छू रहा था, वह असामाजिक हो गया और जो सड़े- गले रीति-रिवाजों को अपना रहा था,वह मां-बाप और सगे-संबंधियों का विशेष स्नेह-भाजन हो गया। एक तरफ अपने पिता से और परिवार से सतत संघर्ष और दूसरी तरफ मनचाही नौकरी पाने के लिए व्यवस्था और जमाने से संघर्ष; इन दोनों मोर्चों पर सतत संघर्ष ने कोमल को बहुत कठोर बना दिया किंतु एक सहेली के साथ ने उसके जीवन रस को सूखने नहीं दिया। कोमल अब एक बड़े कॉलेज में बड़े पद पर नियुक्ति पा चुकी थी। लेकिन इस ऊंचाई तक पहुंचने में उसे हर एक से कदम कदम पर जूझना पड़ा। समाज की जिन बेडियों ने एक बेटी का जीवन बहुत दुर्भर बना दिया है, उन सारी बेड़ियों को एक-एक कर कोमल ने काट डाला। बड़े पद पर पहुंचने के बाद उसे जो ठीक लगा,उसके साथ अपने जीवन की डोर बांधने का फैसला लिया। यह बात परिवार को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को बहुत नागवार गुजरी। जिस बेटी की उपलब्धियां और संघर्ष खुले विचार वालों को उसके प्रति श्रद्धा से भर देती हैं,उसी बेटी को मान्यताओं के कारण अपने घर, परिवार,जाति में कोई जगह नहीं मिलती है। आज कोविड-हॉस्पिटल के बेड पर पड़े हुए पिता को कोमल की बहुत याद आ रही है। उन्हें लगता है कि जो कुछ कोमल के साथ हुआ, वह ठीक नहीं हुआ। समाज की सड़ी-गली परंपराओं को निभाने के चक्कर में जब बाप भी कठोर हो जाए तो बेटी के लिए और कौन सा ठिकाना बचता है? अहंकार के कारण जिस बेटी का नाम लेने से भी वे कतराते थे, आज आत्मा के जग जाने के कारण उनकी एक ही तमन्ना रह गई है कि उस बेटी से कोई भी मिलवा दे। ऐसा हृदय परिवर्तन कभी किसी ने सोचा तक न था। किंतु कोरोना काल में शर शैय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह को अपने लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा नहीं है बल्कि बेटी की प्रतीक्षा है- "जब कभी अहम् पर नियति चोट करती है , कुछ चीज अहम् से बड़ी जन्म लेती है।" - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹