'संवाद' "पुनर्मूषको भव"- कोरोना संक्रमितों की बढ़ती संख्या को देखकर SC की टिप्पणी कि "बद से बदतर हालात हो गए हैं", बहुत चिंताजनक है। प्रधानमंत्री की मुख्यमंत्रियों के साथ 24.11.20 को होने वाली बैठक स्थिति की गंभीरता के द्योतक है। राष्ट्रव्यापी सख्त लॉकडाउन से 'well begun half done' की आशा जगी थी। किंतु सारी तपस्या पर पानी फिर गया। मुट्ठी इतनी कठोर रूप से बांधी गई थी कि अपने आप खुलती चली गई। घर लौटते मजदूरों की मर्मांतक पीड़ा और आजीविका पर प्राणांतक चोट ने सख्त लॉकडाउन पर कई प्रश्न खड़े कर दिए। फिर "जान भी, जहान भी" के मंत्र के तहत छूट दी गई।। फिर चुनाव प्रचार और त्यौहार में छूट की ऐसी गलत व्याख्या की गई कि राष्ट्र गहरे संकट में पड़ गया है। ऋषि ने मूषक को विड़ाल से बचाने के लिए विड़ाल बना दिया।फिर कुत्ते से बचाने के लिए कुत्ता बना दिया। अंत में बाघ खाने आया तो कुत्ते को बाघ बना दिया। किंतु बाघ ने जब ऋषि को ही खाने का इरादा जताया तो ऋषि ने फिर मूषक बना दिया-' पुनर् मूषको भव '। आज तक के सर्वे के अनुसार 76% लोगों ने लॉकडाउन के पक्ष में वोटिंग की है। अब भारत दुष्टचक्र में फंस चुका है। लॉकडाउन लगाता है तो आजीविका पर संकट और नहीं लगाता है तो जीवन पर संकट। "इधर कुआं,उधर खाई" की स्थिति किसने पैदा की? कोई जनता को दोषी मान रहा है तो कोई नेता को। एक मजाक चल रहा है कि कोरोना संक्रमितों की संख्या फिर कम कब होगी? तो उत्तर आता है- बंगाल चुनाव के समय में । यह वक्त न तो दोषारोपण का है और न मजाक का। सबके लिए आत्मविश्लेषण करने का वक्त है। शिक्षा जगत से जुड़े होने के नाते मैंने अनुभव किया कि सारी परीक्षाएं मास्क जरूरी और सामाजिक दूरी के नियमों के तहत करा ली गई और कहीं पर भी कोरोना विस्फोट नहीं हुआ। कोरोना-योद्धा उन ऋषि के समान हैं जो हर कीमत पर जान बचाने का प्रयास कर रहे हैं और नियम तोड़ने वाले उस कृतघ्न बाघ के समान हैं जो ऋषि को खाना चाहता है अर्थात् कोरोना योद्धाओं की मेहनत पर पानी फेर देता है- "कोरोना योद्धाओं की तपस्या पर भारी, कुछ लोगों की मूढ़ता और लाचारी।" -'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹