आनंदम् दिवस
November 28, 2020'संवाद' "आनंदम् दिवस"- कॉलेज शिक्षा राजस्थान में आनंदम् दिवस का अभिनव प्रयोग मस्तिष्क- प्रधान शिक्षा को हृदय-प्रधान बनाने की नीयत से प्रारंभ किया जा रहा है। प्रत्येक माह के अंतिम सप्ताह में एक दिन आनंदम् दिवस मनाया जाएगा जिसमें द जॉय ऑफ गिविंग के भाव एवं विचार के बीज विद्यार्थियों मेँ बोए जाएंगे। व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर किए गए उनके सेवा कार्यों पर प्रेरणास्पद वातावरण बनाया जाएगा तथा उसका मूल्यांकन भी होगा।यद्यपि सही मूल्यांकन के लिए तृतीय-नेत्र की भी जरूरत पड़ेगी। भारतीय संस्कृति जीवन को कई प्रकार के ऋणों से उऋण होने का एक अवसर मात्र मानती है। अतः गुरु सेवा से ब्रह्मचर्य-आश्रम का जीवन शुरू होता था और गृहस्थ- आश्रम में समाज-सेवा का कार्य करते हुए संन्यास-आश्रम में सब कुछ जगत् हिताय त्याग कर जीवन-मुक्त होता था। मस्तिष्क प्रधान शिक्षा ने भोगवादी संस्कृति के प्रभाव में धन-पद-प्रतिष्ठा-लोलुप व्यक्तित्व निर्मित किए जिनमें संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई और देने का भाव लुप्त होता चला गया। अतः कलाम साहब ने कहा कि सम्यक- शिक्षा लेने वाले व्यक्तित्व को देने वाले व्यक्तित्व में परिणत कर देती है। एक छोटी झोपड़ी में एक साधु अपनी पत्नी के साथ बरसात की रात में बैठा हुआ था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। साधु ने कहा दरवाजा खोल दो। पत्नी ने कहा कि इतने छोटे कमरे में 2 आदमी से ज्यादा सो नहीं पाएंगे। साधु ने कहा कि सोने के लिए कम जगह है किंतु बैठने के लिए पर्याप्त जगह है। बरसात की रात हम बैठकर गुजार लेंगे। फिर कुछ देर के बाद और किसी व्यक्ति ने दरवाजा खटखटाया। साधु ने कहा दरवाजा खोल दो क्योंकि पैर पसार कर बैठने की जगह पैर समेट कर बैठने के लिए जगह पर्याप्त है। यह कहानी संदेश दे रही है कि जगह महल या झोपड़ी में नहीं हृदय में होती है। आनंद हृदय से जुड़ा हुआ है, मस्तिष्क से नहीं। इस मस्तिष्क-प्रधान दुनिया में जितनी सुविधाएं जुटाई जा रही हैं,उतना ही दुख बढ़ता जा रहा है क्योंकि वह हृदय गायब हो गया जो देने और बांटने की कला जानता था। अंत्येष्टि संस्कार के अवसर पर मरने के बाद घर वाले द्वारा जो दान दिया जाता है, उसका उद्देश्य है कि परलोक में मृत व्यक्ति को दान रुपी पुण्य का लाभ हो। लेकिन वह पुण्य द जॉय ऑफ गिविंग के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही इसी जीवन काल में अर्जित कर सकता है।। शिक्षालयों की जिम्मेवारी है कि यह भाव और विचार अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं ताकि एक हृदयसंपन्न व्यक्तित्व का निर्माण हो सके जो महल में रहे या झोपड़ी में किंतु जीता अपने हृदय के आनंद में है- "अक्ल की सतह से थोड़ा उतर जाना है , भाव के दरिया में थोड़ा बह जाना है". डॉ सर्वजीत दुबे, प्राचार्य,HDJGGC,BSW.🙏🌹