सिलेबस की पुस्तकें पढ़ने के लिए हम कॉलेज आते हैं,पहले सिलेबस पूर्ण कराया जाए क्योंकि उसी से प्रतियोगिता- परीक्षा में प्रश्न आते हैं।
December 2, 2020'संवाद' आनंदम् की चुनौती- विद्यार्थियों को प्रोफेसर जब द जॉय ऑफ गिविंग का महत्व बताते हैं तो विद्यार्थी कहते हैं कि "सिलेबस की पुस्तकें पढ़ने के लिए हम कॉलेज आते हैं,पहले सिलेबस पूर्ण कराया जाए क्योंकि उसी से प्रतियोगिता- परीक्षा में प्रश्न आते हैं।" प्राचार्य के समक्ष जब यह प्रश्न लाया गया तो मेरे ध्यान में एक कहानी आई। महात्मा बुद्ध का एक शिष्य उनके उपदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए एक इलाके में गया था। उस गरीब इलाके में एक भी शख्स उपदेश सुनने को तैयार नहीं था।शिष्य ने यह बात आकर बुद्ध को बताई। बुध्द उस इलाके में कई शिष्यों को लेकर पहुंचे। उपदेश के नाम पर जो लोग दूर भाग जाते थे, उन्होंने उनकी माली हालत देखी और अपने शिष्यों को उनके लिए विशेष खाने की व्यवस्था करने को कहा। खाने को देखकर सभी लोग पास आ गए। बुद्ध ने सभी को प्रेम से खाना खिलाया और गले लगाया। और बिना एक शब्द बोले हुए गांव वालों को नमस्कार कर के वापस अपने मठ में आ गए। शिष्यों ने पूछा कि भगवान आपने उपदेश तो कुछ दिया ही नहीं? बुद्ध ने कहा कि भूखों को उपदेश नहीं, खाना दिया जाता है।। हमें यह विचार करना ही होगा कि आखिर हमारे विद्यार्थी क्या चाहते हैं और क्यों चाहते हैं? हम सभी का अनुभव रहा कि रोजगार की एक्स्ट्रा क्लास में विद्यार्थी कॉलेज- प्रशासन के सारे ईमानदार प्रयासों के बावजूद अच्छी संख्या में उपस्थित नहीं हुए। उसी प्रकार की मन:स्थिति विद्यार्थियों की आनंदम् के प्रति भी हैं। ऐसे में हर विषय के सिलेबस को रोजगारपरक और आनंदपरक बनाने की चुनौती शिक्षा-जगत के समक्ष है ताकि विद्यार्थी क्लास में आवें और महाविद्यालय विद्यार्थी- केंद्रित शैक्षणिक और सह-शैक्षणिक गतिविधियों के जीवंत केंद्र बन सकें। -'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹