ठिठुरती रात में नंगे पांव किसान खेत में जाता है , तब कोई अनाज बाजार में आता है।
December 4, 2020'संवाद' किसान के मुद्दे की समझ मुझमें थोड़ी भी नहीं है किंतु बचपन से ही यह देखते आया हूं कि 50 सदस्यों के संयुक्त परिवार में दो-तीन लोग ही मिलिट्री या पुलिस की छोटी-मोटी नौकरी में थे और बाकी लोग खेती के काम में लगे हुए थे। गंगा किनारे की उपजाऊ भूमि में इतना जरूर उग आता था कि सभी का भरण-पोषण हो जाता था और शादी समारोहों के भी खर्चे निकल जाते थे। आज स्थिति ठीक उलटी हो गई है। सिर्फ दो-तीन लोग खेती के काम को संभाल रहे हैं और वह भी बेमन से तथा मजबूरी में ; और बाकी सभी शहरों की ओर पलायन कर गये। चंद हजार रूपयों के बदले में अपना घर छोड़ना,खेत छोड़ना और परिवार छोड़ना बहुत बड़ी विवशता में उठाया गया कदम है,जिस पर गंभीर राष्ट्रीय विचार-विमर्श होना चाहिए। किंतु दुर्भाग्य की बात है कि कोरोना काल मेँ सामने आई हुई पलायन की इतनी बड़ी त्रासदी भी शीघ्रता से भुला दी गई। आज जब किसानों ने दिल्ली को घेर लिया है तो किसान का मुद्दा (MSP)सुर्खियों में है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात है कि सरकार कह रही है कि उन्होंने किसान के लिए बहुत अच्छा कानून बनाया है और किसान कह रहे हैं कि हमें यह कानून नहीं चाहिए। पहले समाज और संबंधित पक्ष से मांग उठती थी ,आंदोलन होता था;तब उस मुद्दे पर सरकार कानून बनाने को विवश होती थी। आज समय बदल गया है।सरकार अध्यादेश लाकर कानून बना देती है और जिसके हित के लिए कानून बनाया गया है,उसे बहुत देर बाद समझ में आती है कि इसको रद्द करवाने के लिए बहुत बड़ा आंदोलन करना पड़ेगा अन्यथा किसान गुलाम बन जाएंगे। कितना मुश्किल है इन किसानों के लिए आंदोलन करना क्योंकि उनके पास इतनी बड़ी बचत नहीं होती कि आंदोलन के दौरान सारे खर्चे बचत में से निकल जाए। फिर भी हजारों की संख्या में बूढ़े-बुजुर्ग किसानों को इस ठिठुरती रात में सड़क पर देखकर उनकी मजबूरियों का अंदाजा तो हो ही जाता है- "ठिठुरती रात में नंगे पांव किसान खेत में जाता है , तब कोई अनाज बाजार में आता है।" लेकिन किसानों की बहू- बेटियों द्वारा सूने खेत में मोर्चा संभाल लेना उनके संघर्ष के अटल इरादे को भी दिखाता है। लोकतंत्र के लिए यह कितना दुर्भाग्य का दिन आ गया है कि आंदोलनरत किसान किसी भी राजनीतिक दल को आंदोलन-स्थल पर नहीं आने का निवेदन कर रहे हैं। एक समय था कि गांधी जी को एक किसान पं. राजकुमार शुक्ला जी निवेदन करके 1917 में चंपारण ले गए कि किसानों के आंदोलन का आप नेतृत्व कीजिए और 100 वर्षों के बाद राजनीतिक नेतृत्व के विकास की कहानी यहां पहुंची है कि 2020 के किसान आंदोलन की निगरानी किसान कर रहे हैं कि कोई भी राजनीतिक या बाहरी तत्व आकर भटका न दे। शुभ संकेत यह है कि पूर्व राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और कलाकार भी किसानों के समर्थन में आ गए हैं। अचरज तो यह है कि शिक्षाजगत जो विचार निर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता था और वस्तुस्थिति तथा सत्य का दर्शन करा सकता था, वह मार्गदर्शक आज तटस्थ और निर्लिप्त बना हुआ है क्योंकि शिक्षा जीवन के जड़ों से जुड़ी हुई नहीं है। जबकि गांधीजी किसान का संघर्ष हो या स्वतंत्रता का संघर्ष; समाज और देश के सभी वर्गों को उस संघर्ष से जोड़ लेते थे। एक एग्रीकल्चर के प्रोफेसर ने कहा कि जिस देश में स्थानीय भाषा में पढ़ाने लायक कृषि को विदेशी भाषा में पढ़ाया जाए, उस देश में किसान के घर में पैदा होने वाला प्रोफ़ेसर भी दूरी बना ले तो आश्चर्य क्या है?- "आज के बुद्धिजीवी हर मामले में प्रायः तटस्थ रहते हैं , उससे भी बड़ा अपराध कि वे स्वयं को निर्लिप्त कहते हैं ।तटस्थता और निर्लिप्तता में बहुत अंतर है , अपनी जिम्मेदारियों से बचने का यह अनूठा जंतर है।।" -'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹