'संवाद' "लोकल टीचर ने बनाई ग्लोबल पहचान" - परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल हो और पद चाहे कितना भी छोटा हो, किसी प्रतिभा के प्रस्फुटन को रोक नहीं सकती। सोलापुर के प्राइमरी स्कूल के शिक्षक रंजीत डिसले को ग्लोबल टीचर पुरस्कार के रूप में 7 करोड़ रुपए की राशि का मिलना शिक्षा जगत के लिए विशेष गर्व की बात है। उन्होंने अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग कर पहली बार पुस्तकों में क्यूआर कोड का इस्तेमाल किया। इनके QR-code पुस्तकों में छापे गए हैं। इसे स्कैन कर स्टूडेंट अपने मोबाइल या टैब पर आसानी से इसे देख सुन सकते हैं और पढ़ सकते हैं। विद्यार्थियों के लिए अत्यंत सुविधाजनक और कम खर्चीली तकनीकी ईजाद(QR-code) एक शिक्षक का विद्यार्थियों के प्रति प्रेम का और अपने कर्तव्य के प्रति समर्पण का बहुत बड़ा सबूत है। महाराष्ट्र के सोलापुर में स्थित इस शिक्षक के सरकारी स्कूल में न बिजली थी और न पीने का पानी था और इमारत भी जीर्ण-शीर्ण थी। स्कूल में छात्र बहुत कम आते थे तो रंजीत जी ने इलाके के पैरेंट्स को समझाया कि बच्चों की जगह कक्षा में होती हैं,खेत में नहीं। बच्चों की पढ़ाई में रुचि जगे,इसके लिए उन्होंने अपने पिता से पैसे उधार लेकर लैपटॉप खरीदा और उनके साथ बैठकर कई अच्छी फिल्में देखी। अपने कंप्यूटर ज्ञान को उन्होंने विद्यार्थियों की रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाने के लिए उपयोग किया। इस प्रकार से सतत चिंतन-मनन करते हुए वे गरीब विद्यार्थियों के हित में अपने तकनीकी कौशल को बढ़ाते चले गए। विश्व के 140 देशों से 12 हजार से अधिक अध्यापकों के नामांकन में से अंतिम 10 में से विजेता के रूप में उनका चयन उनकी प्रतिभा को विशेष पहचान देता है। किंतु इनाम में मिले 7 करोड़ रुपए की राशि में से आधी रकम टॉप टेन में आए बाकी 9 प्रतिस्पर्धियों को दे देना और शेष आधी रकम नवाचार कोष के लिए दान कर देना उनके विराट हृदय को दुनिया के सामने लाता है। रिसर्च के लिए बड़ा संस्थान और बड़ी सुविधा चाहिए किंतु रंजीत जी ने अपनी प्यास,प्रतिभा और परिश्रम के बल पर छोटी जगह से ही बड़े शोध संस्थानों का ध्यान आकर्षित कर लिया है- "कुसुम मात्र खिलते नहीं राजाओं के उपवन में , अमित बार खिलते वे पुर से दूर कुंज- कानन में । कौन जाने रहस्य प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल , गुदड़ी में रखती चुन-चुनकर बड़े कीमती लाल।।" विचारणीय बात यह है कि यूनेस्को और लंदन के वार्की फाउंडेशन द्वारा भारत के इस शिक्षक की प्रतिभा को पहचाना गया किंतु भारत अपनी प्रतिभाओं को पहचानने और उन्हें प्रोत्साहित करने की कला कैसे भूल गया? विश्व की सारी प्रतिभाओं को तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय पहचान भी लेती थी और आकर्षित भी कर लेती थी, तब भारत विश्व- गुरु बना। आज गुरुओं की भारत में जैसी स्थिति हैं,उसे देखकर अंतरात्मा कराह उठती है। पढ़ने-पढ़ाने वाला और जीवन बनाने वाला शिक्षक आज विद्यार्थियों से भी दूर हो चुका है और स्वयं से भी दूर हो चुका है; अतः न घर का है और न घाट का-" सिलसिले खत्म हो गए अब हालात अजीब है ; हम कहीं के न रहे घाट और घर करीब है। "-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹