'संवाद' "द जॉय ऑफ गिविंग" को जीने वाले जिंदा लोग ही आनंदम् के सच्चे ब्रांड एंबेसडर होंगे। आनंदम् की कार्यशाला से बहुत कुछ सीखने को मिला। माननीय शिक्षामंत्री जी ने परहित में किए गए छोटे-छोटे कार्य से बड़े बदलाव लाने का आह्वान किया। MLSUकुलपति जी ने यह बात कही कि कर्त्तव्य-प्रधान समाज का निर्माण शिक्षालयों की जिम्मेदारी है। GGTUकुलपति जी की यह बात महत्वपूर्ण लगी कि जीवन को एक अनावश्यक दौड़ बना दिया गया है, जिसमें विश्राम के लिए कोई जगह नहीं बची। ब्रह्मकुमार मृत्युंजय जी ने मन के अपराधीकरण,समाज के संप्रदायीकरण और हर चीज के व्यवसायीकरण को जगत की मुख्य चुनौती बताया। मुख्य वक्ता ने सच्चिदानंद स्वभाव की ओर लौटने का आह्वान किया। दिलो-दिमाग में ये सारी बातें निरंतर गूंज रही हैं और स्वयं से ही मन एक प्रश्न कर रहा है कि इतनी सारी अच्छी बातें अगली पीढ़ी के जीवन में कैसे उतारी जाए? तभी एक छोटी कहानी ध्यान में आई कि- द्रोणाचार्य ने कौरव और पांडव सभी राजकुमारों को "क्रोधं मा कुरु"(क्रोध नहीं करना चाहिए) का पाठ दिया। दुर्योधन ने यह पाठ सबसे पहले स्मरण कर सुना दिया। धीमे-धीमे अन्य राजकुमारों ने भी गुरु को पाठ सुना दिया। किंतु धर्मराज युधिष्ठिर महीनों बीत जाने पर भी पाठ याद होने से इनकार करते रहे। अंत में गुरु का धैर्य टूट गया और उन्होंने अपनी छड़ी से ताबड़तोड़ युधिष्ठिर की पिटाई शुरू कर दी। पचासों छड़ी के दाग पीठ पर पड़ने के बाद भी शांत युधिष्ठिर ने कहा कि गुरुवर! ऐसा लगता है कि पाठ थोड़ा-थोड़ा याद हो रहा है क्योंकि हर छड़ी में आपकी कृपा दिखाई दे रही है, क्रोध नहीं। लेकिन युधिष्ठिर का जवाब सुनते ही द्रोणाचार्य की आंखों से अश्रु-धारा बहने लगी। गुरु ने धर्मराज को गले लगाया और कहा कि वत्स! पाठ तुझे तो याद हो गया है लेकिन मैं भूल गया। शिक्षा जगत को यह ध्यान रखना होगा कि विद्यार्थी हमारे जीवन और आचरण को सबसे पहले देखते हैं, वचन को सबसे बाद में। अतः शिक्षा की परिभाषा मेरे समझ में यह आई है कि "तुमको जो खुद से मिला सके वही शिक्षा है , वरना एक भिखारी को दूसरे भिखारी के द्वारा दी गई भिक्षा है।"- हम शिक्षकों को यह ध्यान रखना होगा कि द जॉय ऑफ गिविंग की शिक्षा देनी है, महज सूचना नहीं।- 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹