एक अनार सौ बीमार
December 7, 2020'संवाद' प्रश्न-ज्ञान आनंद है तो आज शिक्षा-क्षेत्र में इतना तनाव क्यों हैं? प्रिय विद्यार्थी!आज की शिक्षा पूर्णतया मस्तिष्क-केंद्रित है, प्रतिस्पर्धात्मक है और बाहर की जानकारी को अंदर ठूंसनेवाली है। इस शिक्षा के द्वारा पाई जाने योग्य जो चीजें हैं, वे सब बाहरी हैं-धन,पद, प्रतिष्ठा। "एक अनार सौ बीमार" वाली प्रचलित कहावत में तो अनार आज एक से भी कम हो गया और बीमार करोड़ों हो गए। सामान्य-ज्ञान में प्रारंभ से ही विद्यार्थी टिंबक्टू कहां है,ट्रंप कौन है और ट्रेन कैसे बनती हैं ;यह रट रहा है। स्मृति आधारित शिक्षा ने मनुष्य को मशीन बना दिया और जो जितना ही परफेक्ट मशीन हो गया,उतना ही ऊंचे ओहदे पर पहुंच गया। शिक्षा नगरी कोटा में डिप्रेशन का शिकार होने वाले और आत्महत्या करने वाले बच्चे अधिकतर वे हैं,जो परफेक्ट मशीन नहीं बन पा रहे हैं। परफेक्ट मशीन बनने के बाद ओहदा बड़ा मिल जाने पर उसके अहंकार को और रस आने लगता है तथा वह असाधारण तथा विशिष्ट होने की बीमारी से ग्रस्त हो जाता है। अहंकार दूसरे को नीचा दिखाए बिना नहीं रह सकता। अतःआईएएस टॉपर की भी शादी टिक नहीं पाती।। विनम्रता को देने वाली विद्या कुछ और हैं जो हृदय केंद्रित होती हैं। उसमें सफलता नहीं सुफलता मुख्य होती हैं। उसकी प्रवृत्ति दूसरों से आगे निकलने की नहीं बल्कि सबके साथ जीने की होती है। वह किसी का हक छीन कर नहीं बल्कि किसी का हक दिला कर आनंदित होता है। उसकी सारी खोज स्वयं की आत्मा की खोज है। ऐसे आत्मवान लोगों के पास धन, पद,प्रतिष्ठा भी आती हैं तो वे दूसरों के कल्याण के लिए इसका सदुपयोग कर लेते हैं। अभिनेता सोनू सूद ने प्रवासी मजदूरों को अपने पैसे से घर पहुंचा कर जो आनंद पाया, वह अवर्णनीय है। आत्मोन्मुखी शिक्षा से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह द जॉय ऑफ गिविंग को अनुभव करता है- "वृक्ष कबहु नहीं फल भखै, नदी न संचै नीर ; परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर" . आनंदम् द्वारा इस भाव को जागृत करने का एक बड़ा अभियान शुरू किया जा रहा है, जो स्वागत योग्य है। किंतु इसमें प्रमाण(Proof) और प्राप्तांक(Marks) पर निगाहें कम हो और देने के भाव तथा परोपकार के कर्म पर सदैव ध्यान रहे तो यह मील का पत्थर साबित होगा। आज भी लोगों की मंदिरों में इतनी आस्था है कि करोड़ों के चढ़ावे चढ़ा देते हैं और उनका नाम तक पता नहीं चलता है क्योंकि उनका हृदय द जॉय ऑफ गिविंग से भर जाता है। प्राचीन काल में देवालय ही शिक्षालय भी होते थे। देवालयों की तरह शिक्षालय भी यदि भाव संपन्न होकर अपने सत्कर्मों से विद्यार्थियों में अपने प्रति आस्था जागृत कर सके तो यह ज्ञान उन्हें आनंद से भर देगा। - 'शिष्य-गुरु संवाद'के डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹