पंछी उन्मुक्त गगन के
December 8, 2020'संवाद' "पंछी उन्मुक्त गगन के" -27 वर्षीय एक छात्रा प्राचार्य-कक्ष में कल आई जिसके बोर्ड परीक्षाओं में 70% से ऊपर नंबर थे किंतु बीए करते ही 2013 के बाद उसकी पढ़ाई छूट गई। शक्लो-सूरत से लेकर दिलो-दिमाग तक में परमात्मा ने कोई कमी नहीं छोड़ रखी थी। किंतु पिता और पति की सोच ने उसकी प्रतिभा को संवरने नहीं दिया। पिता जल्दी से कन्यादान कर मुक्त हो गए और पति अपने स्वामी-भाव के कारण उसके साथ दासी की तरफ व्यवहार करने लगे। पिता और पति दोनों ने ₹1000 फीस तक की रकम देने से मना कर दिया और उसकी पढ़ाई रुक गई। ससुराल का कलह उसे जीने नहीं देता था और पिता उसे अपने घर आने नहीं देते थे क्योंकि वह अब पराई-धन हो चुकी थी। एक छोटी सी बच्ची को बड़ा करने के लिए उसने किसी शिक्षालय में Peon की नौकरी कर ली। संस्था-प्रधान ने कहा कि तुम्हारी प्रतिभा तो एक शिक्षक होने लायक है किंतु डिग्री नहीं होने के कारण तुम्हें पढ़ाने का काम नहीं दिया जा सकता। छात्रा ने कहा कि सर!मैं Peonकी नौकरी भी शिक्षकीय भाव से करूंगी। मुझे तो सिर्फ अपनी बेटी के लालन-पालन और पढ़ाई की चिंता है ताकि इसकी जिंदगी खराब न हो। अब इस छात्रा को B.Ed करने का मौका हाथ लगा है और वह अपने बलबूते पर शिक्षक भी बनना चाहती है तथा अपनी बेटी का जीवन संवारना भी चाहती है। किंतु PTET में सफलता के बदले उसे शाबाशी की जगह घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा। मैंने उसे दो-तीन महिला प्रोफेसरों की जिंदगी की कहानी सुनाई,जिन्होंने इस समाज की खड़ी की गई बाधाओं के बावजूद अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व और अस्तित्व बना लिया। उसकी आंखें चमक उठी। ससुराल पक्ष या पीहर पक्ष इतना दरिद्र नहीं है कि छात्रा को दूसरों से आर्थिक सहायता मांगनी पड़े किंतु सोच की दरिद्रता इतनी बड़ी है कि उसके जीवन के अनमोल 7 साल मानसिक यंत्रणा में निकले। "जेल में कन्या महाविद्यालय" शीर्षक पर लिखी अपनी कविता मैंने उसको सुनाई-
" जहां कभी जेल की दीवारें थीं , वहां आज चिड़ियां चहचहाती हैं ।"
"नित नए-नए गीत गाती हैं और अपने सपनों को सजाती हैं ।।"
"समाज से कह दो उनको थोड़ा अवकाश चाहिए "
"और सरकार से कह दो कि एक खुला आकाश चाहिए।।।"
- एक नए संकल्प और एक नए विश्वास के साथ जब उसने चरण-स्पर्श किए तो मुझे एहसास हुआ कि द जॉय ऑफ गिविंग का कितना बड़ा क्षेत्र खुला हुआ है,जहां सिर्फ सही सोच देकर किसी की श्रद्धा अर्जित की जा सकती है। सोच बड़ी हो तो भारत सोने की चिड़ियां बन जाए किंतु अपनी चिड़ियाओं के पर काटकर हम तो सिर्फ शोक-गीत सुनने के आदी बन चुके हैं -"मैं नीर भरी दुख की बदली..". 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹