'संवाद' रफ्तार का कहर- कल शाम के वक्त मोबाइल पर बात करते हुए तेज रफ्तार से चालक ने गली में गाड़ी मोड़ पर घुमाई और छोटा पिल्ला पहिए के नीचे आ गया। खेलते हुए बच्चे दौड़े और मासूम से पिल्ले के इर्द-गिर्द बैठ गए। छत पर टहलते हुए मेरी नजर अचानक वहां गई तो मैंने जोर से आवाज लगाई। सारे बच्चे नीचे आंखें गड़ाए गुमसुम से खड़े थे। आवाज पर बच्चों की प्रतिक्रिया नहीं पाकर मैं दौड़ा। रौंदा हुआ पिल्ला पड़ा था, उसके खून के छींटे दूर तक बिखरे थे और सारे बच्चों की आंखों में आंसू तथा दिल में आग धधक रही थी। बड़ी मुश्किल से उन्हें घर वापस लाया और शांति से सारी बात पूछी। किंतु वे तो रोए जा रहे थे और अंकल के द्वारा तेज गाड़ी चलाने की रट लगाए जा रहे थे। कुछ देर के बाद कुत्तिया आ गई और वह अपने मरे हुए बच्चे को हर तरफ से चलाने की कोशिश कर रही थी। रात के खाने के वक्त कुत्तिया के पास बच्चे दूध और रोटी लेकर पहुंचे। कुत्तिया ने मुंह फेर लिया। बच्चों ने भी खाना नहीं खाया और वे अंकल के पास चुपके से शिकायत करने जा रहे थे। 11:00 बजे रात में छत पर से मैंने कुत्तिया को वहीं पर बैठे हुए देखा और सुबह 5:00 बजे देखा तो वह मांस के चिथड़े को दुलार रही थी। मां की ममता का कोई जवाब नहीं। मां को मालूम ही नहीं कि उसके बच्चे पर रफ्तार का कहर टूट चुका था। गली के बच्चे भी सुबह में फिर वहीं इकट्ठे हो गए। बच्चों को ज्यादा भावुक होते देखकर मुझे चिंता हुई तो मैंने समझाया कि इतना ज्यादा शोक-मग्न होने की कोई बात नहीं, मैं उन अंकल से जाकर बात करके कह दूंगा कि आगे से रफ्तार में इस गली में गाड़ी न चलाएं। एक बच्चे ने कहा कि आप अंकल से यह कहिए कि हमारा पिल्ला लौटाएं।। मैं चुपचाप अपना सा मुंह लिए वापस लौट गया। कुत्तिया के लिए और बच्चों के लिए यह हृदय-विदारक घटना थी और बड़ों के लिए सिर्फ विचारणीय - *


बच्चों का झुकना और बड़ों का खुदा हो जाना ,


अच्छा नहीं है इतना बड़ा हो जाना। - 'शिष्य- गुरु संवाद'से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹