कर्मण्येवाधिकारस्ते
December 10, 2020'संवाद' मानवाधिकार कितने सुरक्षित?- 10 दिसंबर,1948 को यूएनओ की महासभा में मानव अधिकारों की घोषणा की पहल पूंजीवादी देश अमेरिका ने की थी और उस सभा में सोवियत रूस सहित आठ समाजवादी देश अनुपस्थित थे। हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराने वाला अमेरिका विश्व भर में मानवाधिकारों के संरक्षण की वकालत करता है। लेकिन आज भी मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा ज्यों का त्यों बना हुआ है। नीतियां कितनी भी अच्छी बना दी जाए किंतु उसकी क्रियान्विति तो नीयत पर निर्भर करती है। नीयत साफ और पवित्र हो तो एक का कर्तव्य दूसरे का अधिकार बन जाता है। सत्ता के विरुद्ध मानवाधिकार का संघर्ष चलता है किंतु विडंबना यह है कि सत्ता से ही इसको संरक्षित भी किया जाना है। सत्ता एक हाथ से जो अधिकार देती है,बहुत चालाकी से दूसरे हाथ से छीन लेती है। इसीलिए पश्चिमी विचारक लॉर्ड एक्टन को कहना पड़ा सत्ता व्यक्ति को भ्रष्ट कर देती है । किंतु भारतीय संस्कृति में राम के हाथ में सत्ता आई तो वे भ्रष्ट नहीं हुए। क्योंकि राम का जीवन कर्तव्य- परायण था। जिस सत्ता को अपने नागरिकों को अधिकार देने होते हैं, वे स्वयं के कर्तव्य पर ज्यादा जोर देती हैं। पिता का कर्तव्य पुत्र के अधिकार को सुनिश्चित कर देता है और पुत्र का कर्तव्य पिता के अधिकार को। आज समस्या यह है कि हर पक्ष सिर्फ अधिकार की बात कर रहा है। अतः मानवाधिकार की बातें तो खूब हो रही हैं किंतु विश्व के हर कोने में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है-कहीं वर्ण के नाम पर तो कहीं जाति के नाम पर , कहीं धर्म के नाम पर तो कहीं क्षेत्र के नाम पर। अतः भारतीय संस्कृति का निचोड़ वाक्य है - 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' अर्थात् कर्म में ही तेरा अधिकार है। 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹