'संवाद' क्लास के लिए तड़प विद्यार्थियों में इतनी तीव्रता से उठने लगी हैं कि यदि जल्द से स्कूल-कॉलेज नहीं खोले गए तो उनके मानसिक- स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। 10 साल का पड़ोस का एक बच्चा जिसकी गहरी रूचि खेलने और गाने- बजाने में हैं, वह जब भी मिलता है तो पूछता है कि स्कूल कब खुलेगा? मैंने कहा कि तेरी रूचि तो पढ़ने में एकदम नहीं है तो तू फिर क्लास के लिए क्यों तड़प रहा है? उसका जवाब था-" स्कूल सिर्फ पढ़ने थोड़े जाते हैं, बल्कि बहुत कुछ सीखने जाते हैं।" मैंने कहा कि वह तो तू ऑनलाइन भी सीख सकता है। उसका उत्तर था- ऑनलाइन में मजा नहीं आता है। मैं तो मम्मी- पापा के कहने पर मोबाइल ले करके बैठ जाता हूं किंतु जब पढ़ाई समझ में नहीं आती तो गेम खेलने लगता हूं। और उस गेम में भी क्या मजा आएगा जिसमें हमारे संगी-साथी शामिल नहीं हों। लेकिन उसने जो टीशर्ट पहन रखी थी उस पर Bold Letters में लिखा हुआ था- School ruined my life अर्थात् स्कूल ने मेरा जीवन बर्बाद कर दिया। मैंने पूछा कि ऐसे संदेश को देने वाले टीशर्ट पहन कर तू स्कूल की इतनी याद क्यों कर रहा है? उसका जवाब चौंकाने वाला था- मैथ्स की घंटी मुझे अच्छी नहीं लगती है इसलिए ऐसा टीशर्ट मैंने बाजार में मिलता देखकर खरीद लिया किंतु उसी स्कूल में म्यूजिक की क्लास में मैं घंटों बैठा रहता हूं फिर भी मेरा आनंद खत्म नहीं होता। उस मासूम ने दिल की एक सच्ची बात बताई कि मेरे मम्मी-पापा तो इंजीनियर बनने को कहते हैं किंतु म्यूजिक वाले सर को मैं अपना सच्चा गुरु मानता हूं और उनको देखकर मेरे आनंद का ठिकाना नहीं रहता। मैंने कहा कि अब तो तू ट्यूशन या कोचिंग पर भी तो जाने लगा। बालक ने कहा कि पापा पीछे पड़े रहते हैं, इसलिए जाता हूं,मेरा तो मन वहां भी नहीं लगता। सचमुच जब उस बालक से पढ़ाई की बात होती है तो उसके भविष्य को लेकर चिंता होती हैं किंतु जब उसे तबला या गिटार बजाते हुए सुनता हूं तो दैवीय अनुभूति होने लगती है। तब शिक्षालय की महत्ता का आभास होने लगता है क्योंकि वहां पर तो विद्यार्थी के व्यक्तित्व के सभी पक्षों पर ध्यान दिया जाता हैअतः खिलाड़ी हो या कलाकार, वैज्ञानिक हो या साहित्यकार सभी की प्रतिभा के बीज शिक्षालयों में पहचाने जाते हैं और तराशे जाते हैं। विद्यार्थी स्कूल- कॉलेजों में अपनी प्रतिभा और रुचि के अनुरूप संगत और प्रशिक्षण दोनों पा लेता है। जिस तरह से मछली सागर में रहती है तो सागर के लिए तड़प नहीं उठती किंतु जब लहरों द्वारा किनारे पड़े रेत पर फेंक दी जाती है तो उसी सागर में जाने के लिए उसकी तड़पन देखने जैसी होती है ; वही तड़पन अपने शिक्षालय में जाने के लिए मैं उस बालक में प्रतिदिन देख रहा हूं और अब तो वह भगवान से प्रतिदिन प्रार्थना करता है कि मुझे मेरे स्कूल, शिक्षक और सहपाठी से मिलवा दो। - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹