'संवाद' विद्यार्थी का प्रश्न - घर में इतना अभाव और संकट है कि मैं कैसे पढ़ूं? शिक्षक का प्रश्न -हर प्रकार के अभाव से लड़ते हुए मैं स्वयं अपनी प्यास के कारण प्रोफेसर बन गया किंतु हर प्रकार की सुविधाओं के बावजूद मेरे बच्चे पढ़ना ही नहीं चाहते, क्यूँ? इन दोनों प्रश्नों पर जब मैं विचार कर रहा था तो मुझे जीवन का आश्चर्यजनक-सूत्र दिखाई दिया और एक प्रश्न का उत्तर दूसरे प्रश्न में सुनाई दिया। स्वयं के जीवन का अनुभव बताता है कि घर में इतना अभाव था कि न खाने को बहुत अच्छे व्यंजन थे और न पहनने को ठीक-ठाक कपड़े और न रहने को सुविधायुक्त मकान किंतु पढ़ने को किताबें उपलब्ध थीं और पढ़ाने को शिक्षक तथा इससे भी बड़ी बात कि अभावग्रस्त परिस्थिति से हर हालत में निकलने की मन:स्थिति बहुत मजबूत थी। सहपाठियों का समूह ऐसा था कि कौन ज्यादा अभाव में है, यह निर्णय ही नहीं हो पाता था। कोई भी भगवान से अभाव मांगता नहीं है किंतु जब भाग्य अभाव देता है तो परमात्मा उससे निकलने का गहरा भाव भी हृदय में भर देता है। हमारे ग्रुप में जो बचपन में अपने पिता के मर जाने के कारण और मां के पागल हो जाने के कारण सबसे प्रतिकूल परिस्थिति झेल रहा था,उसे ईश्वर ने सबसे ज्यादा प्रतिभासंपन्न और ज्ञान का प्यासा बनाया था।M.Aतक सिर्फ संस्कृत पढ़ने वाला वह विद्यार्थी नौकरी की खोज में सामान्य-ज्ञान पर ऐसी पकड़ बनाया कि आज UP के सबसे बड़े पुलिस अधिकारीADG हैं। वे सदैव पढ़ते रहते और अभाव की गिनती नहीं करते थे बल्कि ऊंचाइयों पर जाने के भाव को हमेशा जिंदा रखते थे। उन सभी साथियों का संस्कार ऐसा था कि शनिवार और मंगलवार को उपवास किया करते थे ताकि खाने के पैसे बचे तो कोई नई किताब खरीद सकें। उन अभावग्रस्त लोगों का आज मैं जब जीवन देखता हूं तो वे अपने-अपने पदों पर अपने संस्कारों के कारण ईमानदारीपूर्वक अपना कर्तव्य निर्वाह करते हुए बहुत खुश और तृप्त हैं। उन सभी प्रेरणादायी साथियों की चुनौती यह है कि अपने बच्चों में पढ़ने की वह प्यास कैसे पैदा करें जो उनके स्वभाव में थी। यही बात सोचते-सोचते मुझे नींद लग गई तो मैंने सपने में देखा कि- परमात्मा आदेश दे रहा था कि जिन बच्चों को झोपड़ी में पैदा करना है, उनके पास आगे बढ़ने की प्यास दे दो और जिन्हें महलों में पैदा करना है,उन्हें भोग- विलास का आभास दे दो। तब जाकर कहीं संतुलन बनेगा तभी तो दिनकर जी ने लिखा-


*" महलों में गरुड़ न होता है , कंचन पर कभी न सोता है।


बसता वह कहीं पहाड़ों में ,


शैलों की फटी दरारों में". नींद खुली तो मुझे लगा कि _अमीर हैं वे जिनके पास प्रतिकूल परिस्थितियां हैं और उनसे निकलने की प्यास है_ और गरीब हैं वे जिनके पास सारी सुख-सुविधाएं हैं किंतु आगे बढ़ने की कोई प्यास नहीं है। आज किसान इस ठिठुरती ठंड में सड़कों पर 18 दिनों से संघर्ष कर रहे हैं तो मुझे आश्चर्य होता है। मैं एक रात खुले आसमान के नीचे अभी बिता नहीं सकता और किसान आगे भी इससे भी ठंडी रात में बिताने की योजना बना रहे हैं। यह कैसे संभव हो रहा है? तभी गांव से फोन आया और खेती करने वाले भाई ने कहा कि इससे ज्यादा कष्ट में और ठंड या गर्मी में तो हम लोग सालों भर घर में रहते हैं। यह सुनकर मुझे ज्ञान मिला कि भगवान अभाव इसलिए देता है ताकि संघर्ष की अद्भुत क्षमता पैदा हो सके-


" न छप्पर हैं न दीवारें मगर बेघर नहीं है हम ,


खुला आवास है, आवास को आवास रहने दो ।


सुनहरी बात होगी और मौसम भी हरा होगा ,


यही विश्वास है, विश्वास को विश्वास रहने दो"* - 'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹