प्यास न हो तो कैसे गंगाजल पिलाया जाए?
December 18, 2020'संवाद' प्यास की कमी- एकलव्य के पास ज्ञान की प्यास इतनी थी कि द्रोणाचार्य के मना करने पर उसने गुरु की मूर्ति बनाकर धनुर्विद्या सीख ली। मरुभूमि में सड़क के एक किनारे पेड़ की जड़ दूसरे किनारे निकल कर लोहे की पाइप में घुसकर पानी ग्रहण कर रहा था क्योंकि प्यास पानी को ढूंढ ही लेती है। बांसवाड़ा में विश्वविद्यालय लाया गया और हर पंचायत में कॉलेज खोलने की बात की जा रही है किंतु इस बात पर कोई भी नहीं सोच रहा है कि विद्यार्थियों में ज्ञान की प्यास है या नहीं? एक तरफ सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं तो दूसरी तरफ विद्यार्थियों का स्तर इतना गिरता जा रहा है कि एक आवेदन-पत्र की पांच पंक्तियों में पांच गलतियां आसानी से मिल जाती हैं। प्राचार्य के रूप में विद्यार्थियों के और कार्यालय के हर कागजात पर मुझे हस्ताक्षर करने होते हैं। अपनी तरफ से गलतियों को बताने का और सुधारने का प्रयास किया;किंतु 1 साल के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि वर्तनी-अशुद्धि और वाक्य-अशुद्धि में वांछित सुधार नहीं हुआ। अशुद्धि के साथ ही विद्यार्थी स्कूल से कॉलेज में आ गए और कॉलेज से भी उत्तीर्ण हो गए। किंतु अधिकांश विद्यार्थियों में योग्यता की भारी कमी शिक्षा के हालात को बयां कर रहे हैं। कोरोना काल मेँ ऑनलाइन-शिक्षा का हाल यह है कि 10% विद्यार्थी व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़े हुए हैं। जुड़े हुए विद्यार्थियों का 10% भी शिक्षक द्वारा बड़े मेहनत से तैयार किए गए वीडियो और मेटेरियल को नहीं देख रहा है। निष्कर्ष साफ है कि बिना योग्यता के उच्च शिक्षा में प्रवेश देने से विद्यार्थी के लिए पढ़ाई भारस्वरूप हो गयी है और शिक्षक का पढ़ाना निरर्थक। देश,काल और पात्रता को बिना देखे हुए किए जा रहे विद्यादान को हमारी संस्कृति और शास्त्रों में तामसिक दान कहा गया है-
"अदेश काले यद्दानं आपात्रेभ्यश्च दीयते ,
असत्कृतम् अवज्ञातम् तत् तामसम् उदाहृतम्।"_ एक तरफ मैं शिक्षकों की मेहनत देखता हूं_ और दूसरी तरफ विद्यार्थियों की उदासीनता तो मुझे लगता है कि विद्यार्थियों में ज्ञान के प्रति प्यास की कमी शिक्षा जगत की मूलभूत समस्या है। किसी की आंखों के सामने में गंगा बह रही हो किंतु उसे "प्यास न हो तो कैसे गंगाजल पिलाया जाए?" ,इस पर अब गंभीरता से विचार-विमर्श होना चाहिए।-'शिष्य- गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹