'संवाद' 2020 का साल दहशत, गम और आंसुओं के बीच सुकून के पल ढूंढने का साल रहा। कोरोना के बढ़ते प्रकोप के बीच लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही पूरा मंजर बदल गया। सामान के साथ-साथ इंसान से भी लोग खौफ खाने लगे। महामारी जितनी भयावह थी,उससे भी ज्यादा भयावह तरीके से इसकी रिपोर्टिंग हुई। वास्तविक भय से भी ज्यादा काल्पनिक भय ने व्यापार को ही नहीं बल्कि व्यवहार को भी तहस-नहस कर दिया-


' खाने को गम पीने को आंसू , बिछाने को चाहें ढकने को आहें ;


जहां तक जाती हैं अपनी निगाहें,


पांवों में छाले और लंबी हैं राहें। लॉकडाउन के दिन ही सवाईमाधोपुर और हनुमानगढ़ के 2 कॉलेजों का इंस्पेक्शन कर लौटा था। घरवाले कोस रहे थे कि खुद के साथ परिवार को भी खतरे में डालने की क्या जरूरत थी। स्वयं को अपराधी महसूस करता हुआ मैं अत्याधिक सजग होकर पहले से भी ज्यादा एकांत सेवन करने लगा। हॉस्पिटल में बढ़ते मरीजों की संख्या और बेड न मिलने के साथ दम तोड़ने के बाद संवेदनहीन अंतिम संस्कार के दृश्यों ने दिल को झकझोर कर रख दिया। हर दिन संक्रमितों और मौत के बढ़ते आंकड़े वाले नए समाचार के साथ महाकाल पास में आता हुआ महसूस हो रहा था ;लेकिन उसी के साथ महाजीवन भी अंकुरित होने लगा था। कोरोनायोद्धाओं के किस्से एक तरफ मानवीय गरिमा की अद्भुत ऊंचाई का एहसास करा रहे थे तो दूसरी तरफ लौटते प्रवासी मजदूरों को समाज के लोगों ने जो सुरक्षा दी,उससे दिव्य-समाज का सपना साकार हो रहा था। गंगा स्वयं ही साफ हो गई और ओजोन लेयर में किया गया छेद अपने आप भर गया। लंबे लॉकडाउन के कारण जीवन के संकट के साथ जब आजीविका का संकट सामने आया तो लोग मौत के गाल से निवाले छीनने लगे। चुनाव और पर्व-त्यौहार ने तो यह साबित ही कर दिया कि कोरोना के साथ जीने का ही नहीं बल्कि उसे ज्यादा भाव न देने का भी इरादा बना लिया गया है।। कोरोना के कारण घर की शादियों तक में नहीं जाने से मन उदास था ,उस पर से शहर और पड़ोस में असामयिक मौतों ने गहरे सदमे में डाल दिया।' एको रस:करुण एव ' की भाव-स्थिति में जब मैं राजनीति की संवेदनाशून्य चरम-स्थिति को देखता हूं तो भविष्य को लेकर अजीबोगरीब ख्याल मन में उभरने लगते हैं। नौजवान और किसान आशाहीन होते जा रहे हैं। मुझे लगता है कि महामारी से ज्यादा खतरनाक अहंकार की बीमारी है जो समस्त पर्यावरण को प्रदूषित कर देती हैं। जिस पृथ्वी पर स्वास्थ्य और शिक्षा सबको सुलभ नहीं हो पाई,उसी पृथ्वी पर खतरनाक बम और जैविक तथा रासायनिक हथियार धड़ल्ले से बनाए जा रहे हैं और नफरत के बीज बोए जा रहे हैं। भगवान से पूछता हूं कि कोरोना की वैक्सीन के साथ क्या अहंकार को खत्म करने की कोई वैक्सीन दुनिया में कभी बन पाएगी?


पुराने साल का जख्म कुछ और कह रहा है


लेकिन नया साल दस्तक दे रहा है। -


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹