'संवाद'


विश्व हिंदी दिवस 10 जनवरी को मनाया जाता है, यह बात बहुत कम लोगों को पता है।


1949 में 14 सितंबर को संविधान सभा ने निर्णय लिया था कि हिंदी भारत की राजभाषा होगी, तब से हिंदी दिवस के रूप में यही दिन सबको ज्ञात है। किंतु भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिंदी दिवस मनाया था। मूल उद्देश्य है कि हिंदी को विश्व-भाषा बनाया जा सके। इसके लिए यूएनओ में 129 देशों के समर्थन की आवश्यकता है। भारत सरकार इस दिशा में तेजी से कार्य कर रही है। आशा है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा में शीघ्र ही शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि अपने ही देश में हिंदी का विरोध क्यों होता है? हिंदी की शब्द सामर्थ्य और साहित्य संपदा गौरव करने लायक है। समग्र भारत को एकता के सूत्र में बांधकर स्वतंत्रता दिलाने में इसकी भूमिका के सभी ऋणी है। संस्कृत भाषा को हिंदी की जननी कहा जाता है किंतु माता को अपना अस्तित्व सुरक्षित रखने के लिए आज पुत्री का सहारा लेना पड़ रहा है अर्थात् हिंदी माध्यम से ही अधिकांश जगहों पर संस्कृत भाषा पढ़ाई जा रही है। इसके बावजूद हिंदी राजनीतिक मुद्दा हो गया जबकि वास्तव में यह सांस्कृतिक मुद्दा है।


चीनी भाषा के बाद हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी भाषा है और विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों में इस पर अध्ययन- अध्यापन के साथ शोध कार्य भी चल रहा है।


किंतु अफसोस की बात है कि हिंदी समाज की प्रतिभाएं अंग्रेजी मोह से उबर नहीं पाती हैं। इस कारण से हिंदी भाषियों में एक हीन भावना घर कर गई है। व्यवसाय की मजबूरी कुछ और हो सकती है किंतु उसके लिए हृदय से दूरी बनाना कोई जरूरी नहीं है। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करके कुछ बड़ा पद तो मिल जाता है किंतु कोई बड़ा विचारक समाज को नहीं मिल पा रहा है। कारण है कि मौलिक विचार उसी भाषा में हो सकता है जिस भाषा में आदमी जीता है।


पराई भाषा में जिंदगी कामचलाऊ हो जाती है किंतु जीने का आनंद खो जाता है। मनुष्य एक भाव प्रधान प्राणी है। हृदय के गहरे भाव को व्यक्त करने में अपनी भाषा ही समर्थ होती है।इसी कारण से आजकल s.m.s. का जमाना आ गया। गहरी बातें पढ़ने वाले और बोलने वाले का सर्वत्र अभाव होता जा रहा है क्योंकि हमने अपनी भाषा से एक दूरी बना ली।


भाषा से दूर होने के कारण रिश्तो में भी एक दूरी आ गई है।


जीवन पूर्णतया औपचारिक बनता जा रहा है। एक व्यक्ति के निधन का समाचार मिलने पर मैं श्रद्धा सुमन अर्पित करने गया था तो देखा कि मृत शरीर के पास बैठा हुआ पुत्र इंग्लिश में विलाप कर रहा था। सभी असहज महसूस कर रहे थे-


लोरियां सुना करते थे जिसमें,


थे झगड़ते हम हमजोली


उठेगा संगीत मन का


जिसमें है माता की बोली


हिंदी अपने वजूद का विश्वास है। जग में अपनापन का अहसास है। किसी कवि के शब्दों में निज भाषा श्वास और प्रश्वास है-


खुद भी खो जाती है,मर जाती है मिट जाती है


जब कभी कोई कॉम अपनी जबां छोड़ती है


जब्ते गम खेल नहीं है अभी कैसे समझाऊं


देखना मेरी चिता कितनी धुआं छोड़ती है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे विश्व हिंदी दिवस की शुभकामनाओं सहित 🙏🌹