संवाद


"एक सोच यह भी,एक सोच वह भी"


20 माह की बच्ची धनिष्ठा के हृदय, लीवर, दोनों किडनी एवं दोनों कॉर्निया निकालकर 5 रोगियों में प्रत्यारोपित किया गया। माता-पिता बबीता एवं आशीष कुमार ने डॉक्टरों द्वारा 11 जनवरी को बच्ची को ब्रेन डेड घोषित किए जाने पर अपनी लाडली के अंगदान की इच्छा जाहिर की। बच्ची के पहली मंजिल से गिरने पर यह हृदय विदारक स्थिति बनी किंतु विलाप के क्षण में भी एक महान सोच ने 5 मरीजों को नई जिंदगी दे दी।


ऋषि दधीचि ने अपनी हड्डी देकर और राजा शिवि ने अपने अंग कतरकर दूसरे के प्राणों की रक्षा की थी,जिसे हम कहानियों में पढ़ते हैं। किंतु ऐसी महान आत्माएं आज भी हमारे बीच में किसी न किसी रूप में हैँ। अपने जिगर के टुकड़े के अंग दान देकर दूसरे को नई जिंदगी देने की सोच ने मुझे आंसुओं के साथ विस्मय से भर दिया।


दूसरी तरफ एक दरिंदा अपने छोटे चचेरे भाई का सरेआम ब्लेड से गला रेत रहा था और लोग उसका वीडियो बना रहे थे। यूपी में एक डॉल्फिन को कुल्हाड़ी और लाठियों से पीट-पीटकर मारने का वीडियो बनाया जा रहा था और सबके चेहरे पर मारने का आनंद भी झलक रहा था। चेन्नई में एक मेडिकल छात्र ने पिल्ले को छत के किनारे पर लाकर नीचे पटक कर मार डाला और उसका वीडियो बनाकर पोस्ट कर दिया। वह सोच जो ऐसे कारूणिक क्षणों में वीडियो बनाती है मुझे आश्चर्य में डाल रही है । _किंतु उससे भी ज्यादा आश्चर्य में डाल रही है- लाखों लोगों द्वारा ऐसे वीडियो देखे जाने की सोच-


" बदल रहे हैं यहां सब रिवाज अब क्या होगा?


हमें यह फिक्र है कल का समाज क्या होगा??


इंसान में गांधी की भी संभावना है और हिटलर की भी। अतः बीज बोते समय हम सोचें। क्रूरता के खरपतवार तो यूं ही उग आते हैं किंतु करुणा के गुलाब खिलाने में बहुत जतन करना पड़ता है-


ध्वंस बहुत ही सहज मगर निर्माण कठिन है।


पतन बहुत आसान मगर उत्थान कठिन है।।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹