वैक्सीन की करुण कहानी
January 17, 2021संवाद
वैक्सीन की करुण कहानी
एम्स में कार्यरत डॉक्टर प्रेम की नई-नई शादी हुई थी। पत्नी अर्पिता भी डॉक्टर थी। दोनों विदेश जाने की योजना बना ही रहे थे कि लॉकडाउन ने सारा समय-चक्र बदल दिया।
बहुत ही गरीबी से जूझकर अपनी त्याग-तपस्या के बदौलत एक किसान का बेटा डॉक्टर बना था। जमीन का बहुत बड़ा भाग बेचकर पिता ने बेटे की प्रतिभा को संवारा था। अब सुख के दिन करीब थे। लेकिन अचानक कोविड-19 के कारण सबकी छुट्टियां रद्द कर दी गई और 24 घंटे की ड्यूटी लगा दी गई। पीपीई किट में कोरोना-वार्ड की ड्यूटी कठोर तपस्या थी और उस पर से संक्रमण के खतरे को देखते हुए घरवालों से दूरभाष पर ही संपर्क रखने का निर्णय लिया गया।
दूसरी तरफ अर्पिता की भी ड्यूटी लग चुकी थी। इनकी छोटी बच्ची करुणा को दादा-दादी किसी तरह से संभाल रहे थे।
जब महामारी अपना पैर पसार रही थी,उसी समय डॉक्टर रोगियों की सेवा करने के साथ वायरस के लक्षणों पर शोध कर रहे थे।
इसी बीच प्रेम को खांसी-जुकाम के साथ बुखार की शिकायत आई और उनका टेस्ट पॉजिटिव आ गया। जिस वायरस के लक्षण को वे प्रयोगशाला में ढूंढ रहे थे, अब उसे अपने शरीर के अंदर हर प्रकार से महसूस करने लगे। इस खतरनाक बीमारी से जूझते हुए भी प्रेम के दिमाग में एक ही बात चल रही थी- वैक्सीन के निर्माण की।
घरवाले काफी चिंतित थे किंतु अर्पिता का भी टेस्ट जब पॉजिटिव आया तो सभी सदमे में चले गए। किंतु आइसोलेशन में भी प्रेम और अर्पिता की जब बातें होती तो मां-बाप के साथ करुणा के बाद वैक्सीन की ओर बढ़ते हर कदम की तफ्तीश होती।
दादा-दादी का हाल बुरा था किंतु करुणा के सार संभाल में उन्होंने अपने आप को खपाए रखा। दिन रात प्रार्थनाओं का दौर चलता और बेटे-बहू के सलामती की दुआएं मांगी जाती। मां बाप से दूर बच्ची को रख पाना ईश्वर कृपा के बिना संभव नहीं था।
एक तरफ मां-बाप की वृद्धावस्था का ख्याल आता तो दूसरी तरफ बेटी की करुण पुकार रातों में सुनाई देती। इसके बावजूद डॉक्टर प्रेम और अर्पिता जैसे कई डॉक्टर वैक्सीन के निर्माण में जुनून की हद तक लगे हुए थे। लगता है कि जब सारी मानवता के कल्याण की ओर कदम बढ़ाए जाते हैं तो अपना दुख सहने योग्य बन जाता है और लोगों की दुआएं काम आने लगती हैं।
किंतु प्रेम को गहरा सदमा तब लगा जब अर्पिता की हालत बहुत नाजुक हो गई और उसे मिलने की इजाजत तक नहीं मिल रही थी। ऐसे मुश्किल वक्त में भी एक डॉक्टर की निगाह में सर्वप्रमुख कार्य दिन-रात वैक्सीन पर होने वाले काम की जानकारी जुटाकर एक कदम आगे बढ़ जाने का था। ज्यों ही अपने प्रयासों की सफलता का कोई समाचार मिलता तो डॉक्टरों का अपना दर्द कुछ कम होता।
अंततः वह घड़ी आ ही गई जिसका बेसब्री से इंतजार था। 16 जनवरी को टीकाकरण की शुरुआत के साथ भारत ने महामारी से महाजीवन की ओर कदम बढ़ा दिया।
लेकिन हम सभी को दिल की गहराइयों से यह महसूस करना होगा कि वैक्सीन रूपी महाजीवन को प्राप्त करने में कितना प्रेम, कितनी करुणा और कितनी अर्पिता के साथ कितने परिजनों ने कितनी अंधकारपूर्ण रात्रियां बिताई हैं जिसके बाद यह सुबह आई है-
पनपने दे जरा आदत निगाहों को अंधेरों की
अंधेरे में अंधेरा रोशनी के काम आएगा।
पलक पर और बढ़ने दे जरा सा इस समंदर को
तभी तो मोतियों का और ज्यादा दाम आएगा।।
वैक्सीन के निर्माण के बाद वैक्सीन पर जनता को विश्वास दिलाने के लिए वे ही डॉक्टर और वैज्ञानिक आगे आए हैं। आखिर भगवान कहते किसको हैं?
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे जिंदा भगवान को शत-शत नमन 🙏🌹