शहीद दिवस
January 30, 2021'संवाद'
"शहीद दिवस" के दिन बढ़ती हिंसा के दौर में अहिंसा के पुजारी की याद में हम सभी 2 मिनट का मौन रखेंगे।
सप्ताह में 1 दिन का मौन-व्रत रखकर गांधी इतना बड़ा संदेश दुनिया को दे देते थे,जिसे शब्दों में कभी भी नहीं दिया जा सकता। आज की समस्याओं की जड़ में वाचालता है। महात्मा कम बोलते थे और आवश्यकतानुसार बोलते थे क्योंकि उन्हें मालूम था-
वाणी एक अमोल है जो कोई बोलै जानि
हिये तराजू तौल के तब मुख बाहर आनि।
अहिंसक विश्व का निर्माण तभी हो सकता है जब हृदय संवेदनशील हो और मस्तिष्क संवादशील हो। प्रार्थना,उपवास,मौन इत्यादि के द्वारा जब सर्वशक्तिमान सत्ता से कोई अभिन्न रूप से जुड़ जाता है तभी उसे भोली-भाली जनता को लेकर ब्रिटिश सत्ता से लोहा लेने का हौसला मिलता है।
किसानों का चल रहा शांतिपूर्ण आंदोलन एक दिन के कुछ लोगों के उपद्रव से विवादों में आ गया। सैकड़ों किसानों का बलिदान लाल किले पर मचे घमासान के बाद कलंकित हो गया।
गांधी अपने आंदोलन को धैर्य, सहनशीलता और सृजनशीलता से इतना जोड़ देते थे कि उन पर किया गया थोड़ा भी ब्रिटिश अत्याचार आंदोलन को और ज्यादा लोकप्रिय बना देता था।
आज के आंदोलनों की तुलना में जब हम गांधी के आंदोलनों को देखते हैं तो मन,वाणीऔर कर्म की अहिंसा बहुत बड़ा अंतर कर देती हैं। असहयोग,सविनय अवज्ञा, करो या मरो इत्यादि आंदोलनों में नर-नारी,बाल-वृद्ध सभी जुड़ सके क्योंकि सिर्फ ब्रिटिश राज को हटाना ही मकसद नहीं था बल्कि रामराज्य को लाना उससे भी बड़ा मकसद था। महात्मा की नजरों में बिना राम बने रामराज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः वे राजनीतिक सुधार के साथ हमेशा सामाजिक सुधार और आत्मिक सुधार का भी आंदोलन चलाते थे।
बापू को सब कोई अपने-अपने ढंग से श्रद्धांजलि देंगे किंतु विरले ही आत्म-शुद्धि की उस गहरी साधना में उतरेंगे जिसमें गांधी उतरा करते थे। सत्य के साथ प्रयोग करके आत्म सुधार करते जाने से कोई मोहन महात्मा बनता है।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🌹