आप लोग पढ़ाना(Teaching ) छोड़ो, सिखाना(Learning )शुरू करो।
February 6, 2021संवाद
सृष्टि का रहस्य विषय पर कन्या महाविद्यालय में इसरो के वैज्ञानिक, इतिहासकार और संस्कृति-शोधकर्ता डॉ ओम प्रकाश पांडेय जी का व्याख्यान संस्कृत विषय के विद्यार्थी होने के नाते मेरे लिए एक शुभ अवसर रहा। कार्यक्रम शुरू होने के पहले प्राचार्य कक्ष में चर्चा के दौरान मैंने एक जिज्ञासा की- " संस्कृत के गूढ़ ज्ञान और आपके शोध को उन विद्यार्थियों तक कैसे पहुंचाया जाए जो पासबुक से सिर्फ पास होने के लिए कॉलेज में आ रहे हैं?
उनका सहज जवाब था-"आप लोग पढ़ाना(Teaching ) छोड़ो, सिखाना(Learning )शुरू करो।"
मैंने निवेदन किया कि इस पर थोड़ा विस्तार से प्रकाश डालें तो उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान विस्तार से इसको समझाया। उनका मूल संदेश था कि पढ़ाई पुस्तक से जुड़ गई है जबकि यह जीवन से जुड़ी होनी चाहिए। मसलन पर्यावरण विषय शुरू किया गया किंतु हवा,जल,पृथ्वी,आकाश,अग्नि जैसे मूल तत्वों के शुद्धिकरण से विद्यार्थियों को नहीं जोड़ा जा सका। इसके विपरीत पेड़ों की कटाई होने के बाद बनने वाले कागज की खपत और बढ़ गई। मूल उद्देश्य ही विनष्ट हो गया। अधिकतर अगरबत्ती में बांस की तीली का प्रयोग किया जाता है, जिसके जलने से निकली गैस हानिकारक होती है किंतु हम सभी अज्ञानवश अगरबत्ती खूब जलाते हैं। सहज सरल शब्दों में प्रोजेक्टर के माध्यम से ऐसे अनेकों उदाहरण देकर उन्होंने सबका दिल जीत लिया
उसके बाद मैं यही सोचता रहा कि शिक्षा जगत की नीतियां ऐसे व्यक्तित्व की सोच के अनुसार बने तो यह शिक्षा जगत आनंद और ज्ञान से पूर्ण होता और जीवन की जड़ों से जुड़ा भी।
भारतीय ऋषि परंपरा ने जो गहरी से गहरी खोजें की,उनका सबसे बड़ा लाभ पाश्चात्य देशों ने उठा लिया। क्योंकि हमारे संस्कृत के ग्रंथों का उन्होंने गहरा अध्ययन और शोध किया।
पांडेय जी जैसी दिव्य आत्माएं विज्ञान के आधुनिकतम आविष्कारों का स्रोत जब वैदिक परंपरा के ग्रंथों में पाती हैं तो उनका सप्रमाण विश्लेषण जुटाकर भारतीय आत्माओं को जगाती हैं और झकझोरती हैं। उद्देश्य बस इतना होता है कि यदि हम अपनी ज्ञान की निधि का संरक्षण नहीं कर पाएंगे तो विदेशियों के ऋणी बने रहेंगे।
एक सुंदर उदाहरण वे देते हैं कि न्यूटन के नाम से गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत सभी विद्यार्थी रटते हैं। जबकि विदेश की एक मैगजीन ने यह खबर छापी है कि न्यूटन के घर में आर्यभट्ट की एक पुस्तक मिली जिसमें जिक्र है कि आर्यभट्ट ने बिहार के मुजफ्फरपुर में वृक्ष से लीची को नीचे गिरते देखकर पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति होने की सप्रमाण व्याख्या प्रस्तुत की थी। इससे भी पहले वैशेषिक दर्शन में कणाद ऋषि द्वारा इसका सूत्र दिया गया है ।आज विद्यार्थियों को यह पढ़ाया जाता है कि न्यूटन ने पेड़ से सेव को गिरते देखकर गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया।
इसके पीछे उद्देश्य यह नहीं है कि न्यूटन को खारिज किया जाए। किंतु इतना अवश्य सबको ज्ञात होना चाहिए कि कणाद और आर्यभट्ट न्यूटन के प्रेरणास्रोत हो सकते हैं।
शिक्षा के सर्वोच्च शिखर को छूने वाला व्यक्तित्व जब बांसवाड़ा जैसे शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े इलाके में ज्ञान की बारिश करने आता है तो उर्वर धरती के हरे-भरे होने की संभावना जगती है-
किसको सागर, किसको मीना, किसको प्याला चाहिए
मैकदे का दर खुला है पीने वाला चाहिए।।
गंगा को पृथ्वी पर लाने वाले भागीरथ को हम सभी याद करते हैं, उसी प्रकार का भागीरथ प्रयास करने वाले सहृदय जनों का भी हमें ऋणी होना चाहिए जिनके कारण ज्ञान की गंगा इस धरती की प्यास बुझाने आई।
परमात्मा से प्रार्थना है कि पासबुक की विकृति को ढो रहा वागड़ का शिक्षा जगत ऐसे विद्वान को सुनकर मौलिक पुस्तकों की संस्कृति की ओर उन्मुख हो जाए।-
वागड़ के विद्यार्थियों में और शिक्षा जगत में" कुछ लिखकर सो,कुछ पढ़कर सो ।तू जिस जगह जागा सवेरे,उस जगह से बढ़कर सो।।" की अलख जगाने में यह प्रयास मील का पत्थर साबित होगा।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹