प्रचलित मान्यताओं का खंडन
February 7, 2021संवाद
"प्रचलित मान्यताओं का खंडन" भारत सरकार के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार डॉ ओम प्रकाश पांडेय जी ने आज शिक्षा के रहस्य पर से पर्दा हटाया। कल सृष्टि के रहस्य को जितने वैज्ञानिक और मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया था,आज उतने ही दार्शनिक और मनोभंजक ढंग से शिक्षा के रहस्य को उद्घाटित किया। आत्मवान गुरुओं के कारण भारत शिक्षा के शिखर पर था और आज सरकारी नौकर के रूप में काम कर रहे शिक्षकों के कारण शिक्षा और शिक्षक का हाल बुरा है-
जो बांटता फिरता था दुनिया को उजाले,
उसके दामन में आज अंधेरे भी बहुत है।
कुछ प्रचलित मान्यताएं जो गलत हैं ;उन्हीं को शिक्षक पढ़ाए जा रहा हैं-(1) भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ इस पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि केवल 30% भूभाग पर ब्रिटिश सरकार का शासन था ;बाकी 70% पर 650 के लगभग रियासतें शासन कर रही थीं। इन रियासतों में शिक्षा की स्थिति अच्छी थी। इन रियासतों को सरदार पटेल द्वारा भारत में मिलाए जाने के बाद और संपूर्ण देश में ब्रिटिश सरकार के द्वारा चलाए जा रहे मॉडल को लागू किए जाने के बाद शिक्षा पूरी तरह से नौकरशाही की गिरफ्त में आ गई। नौकरशाही प्रशासनिक नियम बनाए तो अच्छा किंतु शिक्षा की नीतियां बनाने लगे तो बहुत खतरनाक हो जाता है।
(2) पहले शिक्षक स्थानीय देशकाल की आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम निर्धारित करते थे किंतु अब प्रशासक सत्ताधीशों के हितों के अनुसार पूरे देश या राज्य पर नीतियां थोपता है।
(3 ) पहले माता-पिता और परिवार जीवन के बुनियादी संस्कारों को देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। अब 2 साल के बच्चे को स्कूल भेजकर मोटी फीस के बदले सारी जिम्मेवारी शिक्षकों पर थोप दी जाती है।
( 4 )शिक्षालय में शिक्षक तोता रटंत पद्धति से विद्यार्थियों को तैयार कर रहा है। मां-बाप भी अच्छे अंक मिलने पर बच्चे का भविष्य अच्छा मानने लगते हैं। शत-प्रतिशत अंक वाली प्रणाली ने हमें इस मुकाम पर पहुंचा दिया कि 90% से नीचे वाला विद्यार्थी हीन भावना से ग्रसित हो जा रहा है। फिर कोचिंग फैक्ट्री में उसे पूर्ण मशीन बनाया जा रहा है,मानव नहीं।
( 5 ) जब पढ़ाई सिर्फ छोटी सी खोपड़ी से संबंधित हो जाए और सारा जीवन अस्पर्शित रह जाए तो शिक्षा जगत में तनाव इतना बढ़ जाता है कि बच्चे डिप्रेशन में आने लगते हैं तथा आत्महत्या तक करने लगते हैं।
(6) ऐसी परिस्थिति में आनंदम् जैसी योजना लाना पड़ता है ताकि किताबी कीड़ा बन चुके विद्यार्थी का संबंध समाजसेवा से हो सके।
हमारी संस्कृति में शिक्षा व्यवस्था जीवन केंद्रित थी जिसमें शिक्षकों को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होती थी ताकि विद्यार्थी के जीवन को सजाने-संवारने में शिक्षक द्वारा अपने अनुभव से योजनाएं बनाई जा सकें तथा पाठ्यक्रम निर्धारित किए जा सकें। आज शिक्षा व्यवस्था व्यवसाय केंद्रित हो चुकी हैं जिसके कारण ज्यादा प्लेसमेंट देने वाली संस्थाएं अव्वल बन जाती हैं। ऐसी परिस्थिति में जब तक शिक्षकों को अपने उत्तरदायित्व का बोध नहीं होता और अपनी चेतना को जगा कर तथा स्वतंत्र बनाकर भावी पीढ़ी को प्रेमपूर्वक संवारने में तल्लीन नहीं होता तब तक भारत का भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता।
शिक्षा जगत में नए प्रयोग होने चाहिए किंतु शिक्षकों द्वारा होने चाहिए ,न कि प्रशासकों द्वारा।
पहले ओम का मंत्र पढ़कर शांति मिल जाती थी किंतु डा. ओमप्रकाश सर को सुनकर बेचैनी बढ़ गई। लेकिन शिक्षा के प्रति उनकी आस्था इतनी दृढ़ है कि स्वयं शिक्षक होने के बावजूद अपने शिक्षकीय धर्म को निभाते हुए उन्होंने शिक्षा की अवनति के लिए शिक्षकों को ही जिम्मेदार माना।
धर्म और राजनीति में यही प्रमुख अंतर होता है। धार्मिक व्यक्ति स्वयं को जिम्मेदार मानता है और राजनीतिक व्यक्ति दूसरे को। संस्कृति की गहराइयों में जाकर नासा के वैज्ञानिक ने अंतरिक्ष की ऊंचाइयों से सत्य का उद्घोष किया है- सत्येन रक्ष्यते धर्म:. अब जिम्मेवारी सभी शिक्षकों की है कि उनकी बातों पर कितना गौर करते हैं तथा अमल करते हैं-
" लब क्या बताएं कितनी अजीम उनकी जात है।
सागर को सीपियों से उलीचने की बात है।।
-'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे- कृतज्ञो अस्मि 🙏🌹