संवाद


आंदोलनजीवी परजीवी नहीं,बल्कि हृदयजीवी होता है- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक;जीवन का कोई भी क्षेत्र हो,उसमें सुधार के लिए सदैव कुछ लोग अपनी आहुति देते रहते हैं और आंदोलन चलाते रहते हैं। क्या वे परजीवी हैं? नहीं,मेरी नजरों में वे अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं और हृदयजीवी हैं। आंदोलन का इतिहास सदियों से बहुत गौरवान्वित रहा है। कुछ लोग दूसरों का दुख देख नहीं पाते और वे अपने सुखों की बलि चढ़ा देते हैं परहित के लिए।


वशिष्ठ और विश्वामित्र ने राम को ऐसी शिक्षा और संस्कार दिया कि दूसरों के उद्धार के लिए आजीवन काम करते रहे और जन-जन को जोड़कर अत्याचार के विरुद्ध सबके हृदय को आंदोलित करते रहे।


कृष्ण ने तो अपने मामा के विरुद्ध आंदोलन किया और अर्जुन को भी अपनों के विरुद्ध धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने हेतु गीता का उपदेश दिया।


मोहन दक्षिण अफ्रीका गए थे किंतु अपने व्यवसाय को छोड़कर रंगभेद के विरुद्ध बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा किया। फिर चंपारण में आकर किसानों के लिए आंदोलन किया। छुआछूत के विरुद्ध और मंदिर में प्रवेश हेतु हरिजनों के लिए आंदोलन किया। हिंदू मुस्लिम एकता के लिए आंदोलन किया। यहां तक कि स्वतंत्रता के आंदोलन में सभी को नौकरी और पढ़ाई छोड़ कर कूदने के लिए प्रेरित किया।


नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तो ICS की नौकरी छोड़कर देश के आंदोलन हेतु अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। सरदार पटेल को क्या पड़ी थी जो किसानों के लिए और पूरे देश को एक करने के लिए इतना बड़ा आंदोलन खड़ा किया। भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद, अशफ़ाकउल्ला जैसे अनेक नौजवानों ने अपनी जवानी स्वतंत्रता के आंदोलन के लिए कुर्बान कर दी। आचार्य श्री विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन के लिए कठोर तपस्या की। नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी "बचपन बचाओ आंदोलन" चला रहे हैं। अन्ना हजारे ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन का नेतृत्व किया।


वन्यजीवों और पशु-पक्षियों की सुरक्षा के लिए लोगों ने आंदोलन खड़े किए हैं। पेड़ों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन हुआ और लोगों ने अपने जान की बाजी लगा दी। यहां तक कि राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन चला और कई लोगों को कुर्बानी तक देनी पड़ी।


दरअसल आंदोलनजीवी के पास एक धड़कता हुआ दिल होता है जो पराए गम से पिघल जाता है-


जिनके पहलू में धड़कता हुआ दिल होता है


पराए गम से वे ही लोग पिघल जाते हैं


ऐसे लोगों के व्यक्तित्व में ऐसी कांति आती है कि आईने भी उन्हें देखने को मचल जाते हैं-


यह कौन सी तासीर है इन चेहरों में,


जिन्हें देखने को आईने मचल जाते हैं।


शिक्षालयों के प्रवेश द्वार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है- ज्ञानार्थ प्रविश,सेवार्थ गच्छ। वैष्णव जन की परिभाषा भी यही है कि - जो पीर पराई जाने रे।


दूसरों के साथ अन्याय होता है और लोग मूकदर्शक बने रहते हैं। निर्वस्त्र तड़पती हुई निर्भया मदद के लिए चिल्लाती रहती है और लोग वीडियो बनाते हुए आगे बढ़ जाते हैं। एक अपराधी का विकास हो जाता है और गांव वाले चुपचाप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं।


"कोइ होवे नृप हमें का हानि ,चेरी छोड़ न होयब रानी" इस मंथरा-सोच से प्रभावित होकर एक समय में राजनीति से तटस्थता बरती गई और परिणाम यह हुआ कि राजनीति जन-विमुख हो गई। फूट डालो और राज करो का सिद्धांत ऐसी परिस्थितियों में पल्लवित-पुष्पित हो जाता है। ऐसे समय में समाज का बुद्धिजीवी हर मामले में प्रायः तटस्थ पड़ा रहता है और उससे भी बड़ा अपराध कि स्वयं को निर्लिप्त कहता है। मेरे अनुभव में जब यह बात साक्षात आई तो मेरा हृदय कराह उठा और आह निकली-


आज के बुद्धिजीवी हर मामले में प्रायः तटस्थ रहते हैं


उससे भी बड़ा अपराध कि स्वयं को निर्लिप्त कहते हैं।


तटस्थता और निर्लिप्तता में बहुत अंतर है


अपनी जिम्मेदारियों से बचने का यह अनूठा जन्तर है।।


मेरी नजरों में तटस्थता नपुंसकता के बहुत करीब है


जहां साहस का अभाव है और आत्मबल बहुत गरीब है।।।


लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि प्रत्येक नागरिक सजग और सतर्क बने और कहीं भी अन्याय होता हुआ देखकर मूकदर्शक न बने रहे।


यदि आंदोलनजीवी का एक वर्ग तैयार हुआ है तो यह गौरव की बात है क्योंकि यह साबित करता है कि बुद्धिजीवियों ने अपनी तटस्थता छोड़नी शुरू कर दी। नौजवानों के आंदोलन में यदि मजदूर,किसान भाग नहीं लेंगे तो फिर मजदूर-किसानों के आंदोलन में नौजवान भी दूरी बनाए रखेंगे।


मोहन को महात्मा बनाने में इस कला ने सबसे ज्यादा योगदान दिया है कि स्वतंत्रता के आंदोलन में उन्होंने नर-नारी से लेकर बाल-वृद्ध तक सबको जोड़ दिया। तभी तो राष्ट्रकवि दिनकर लिखते हैं-


समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध


जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध।


पर्यावरणविद् आंदोलन करते हैं उनकी नहीं सुनी जाती और उत्तराखंड हादसा होता है; शिक्षाविद् आंदोलन करते हैं और उनकी नहीं सुनी जाती परिणामस्वरूप भावी पीढ़ी उपेक्षित हो जाती है। काश!आंदोलनजीवियों की संख्या बढ़ जाती तो राष्ट्रनिर्माता शिक्षक का आंदोलन इतना कमजोर नहीं पड़ता कि पढ़ाने वाले शिक्षकों को गैरशैक्षणिक कार्यों में लगा दिया जाता।


अभी वागड़ धरा पर पधारे भारत सरकार के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार और संस्कृति शोधकर्ता डॉक्टर ओम प्रकाश पांडे जी ने बहुत जोर देकर कहा कि भारत को राम और कृष्ण से भी ज्यादा जरूरत वशिष्ठ और संदीपनी की है क्योंकि गुरु अनेकों राम और अनेकों कृष्ण बना सकता है जो जगत के कल्याण के लिए कष्ट सहते हैं। उस हृदयप्रधान शिक्षा और शिक्षक की आज सर्वाधिक जरूरत है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹