संवाद


हजारों तरह के ये होते हैं आंसू


(1)कॉलेज खुलने के साथ एक कन्या आई और क्लास के बाद फूट-फूट कर रोने लगी। मैंने कारण पूछा तो बहुत मुश्किल से आंसूओं को रोकते हुए बोली कि कोरोना के कारण कॉलेज बंद होने से पढ़ाई से एकदम संपर्क टूट गया है। अब साल भर का कोर्स कुछ महीने में कैसे कर पाऊंगी? किंतु आपने क्लास में विश्वास दिलाया कि हर शिक्षक को यह कला मालूम होती है कि उसके विषय को कम से कम समय में कैसे पूर्ण कर लिया जाए। अतः अपने शिक्षक के संपर्क में प्रत्येक दिन ज्यादा से ज्यादा समय बिताओ, शिक्षक मुश्किल लगने वाले विषय को बहुत आसान बना देगा। इस बात के कारण मेरे आंसू निकल आए कि सब कुछ लगता था हाथ से निकल गया है किंतु अपने शिक्षकों के क्लास में आकर मुझमें फिर से विश्वास जगा है। ये आंसू विश्वास और खुशी के हैं।


(2)दूसरी तरफ बच्चों की तरह बिलख कर रोते हुए एक किसान की आंखों से गिरते हुए आंसुओं को दुनिया ने देखा। कारण पूछने पर किसान ने बताया कि जब सारी तपस्या पर पानी फिर जाए और आप पर ऐसा बदनुमा कलंक लग जाए, जिसकी कल्पना भी न की गई हो तो आंसुओं के अलावा और क्या बचता है?-


आंसू गिरा जो आंख से फिजां बदल गई


हारी हुई बाजी भी इतनी जल्दी पलट गई।


(3)एक आंसू साथ में काम करने वालों की विदाई पर भी निकलते हैं। चाहे पक्ष में काम किया हो या विपक्ष में। साहचर्यजन्य संबंध तो बन ही जाता है। हर बात पर हां कहने वालों से ज्यादा गहरा संबंध मुश्किल से हां कहने वालों से बनता है-


बिना तुम्हारे खेला जाए ऐसा भी यह खेल नहीं है,


सरहद के भी पार हो तो क्या, कैसे कह दूं मेल नहीं है।।


आंखों में गुलाम बना आंसू वक्त की नजाकत देखकर आजाद हो गया।


(4)26 जनवरी को कुछ लोग लापता हो गए। अपने नौजवान बेटे की दास्तां एक मां पत्रकार को कह रही थी और सुनते-सुनते पत्रकार की आंखों से आंसू बहने लगे-


यही जज्बात हर एक दिल में उभर सकते हैं


तेरी आंखों के आंसू मेरी आंखों में उतर सकते हैं।


आंसू की ग्रंथि तो प्रकृति ने नर और नारी में बराबर दी हैं किंतु नारियों ने ही आंसुओं से गहरा रिश्ता बना रखा है। जब किसी पुरुष की आंखों में आंसू आता है तो लोग कहते हैं कि औरतों की तरह क्यों रो रहा है? जबकि गीत के बोल हैं कि-


हजारों तरह के ये होते हैं आंसू


कभी दिल में गम हो तो रोते हैं आंसू


खुशी में भी आंखें भिंगोते हैं आंसू


बेमौसम की बरसात होते हैं आंसू


जब यह आंसू मैंने पुरुषों की भी आंखों में देखा तो सुकून महसूस हो रहा है और राष्ट्रकवि गुप्त याद आ रहे हैं-


नारी के जिस भव्य भाव का साभिमान भाषी हूं मैं


उसे नरों में भी पाने का उत्सुक अभिलाषी हूं मैं।।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹