संवाद


काम हो या प्रेम हो;ये दोनों मानव की सबसे गहरी आवश्यकता और अनुभूति है। काम प्रकृति की और प्रेम आत्मा की इतनी बड़ी जरूरत है कि इसके बिना न तो प्रकृति अपने आप को आगे बढ़ा सकती है और न आत्मा स्वयं को विकसित कर सकती है।


दुर्भाग्य से इन दोनों ही मामलों में शिक्षण और प्रशिक्षण की भूमिका असंतोषजनक रही है। किशोरावस्था में प्रवेश करते ही कोई अनजानी सी शक्ति के वश में जीवन घिरता चला जाता है-


ये शाम मस्तानी मदहोश किए जाए,


मुझे डोर कोई खींचे तेरी ओर लिए जाए।


विपरीत-लिंग के प्रति आकर्षण के इस खेल में मां-बाप और बड़ों की भूमिका पहरेदार और निंदक के रूप में होती हैं-


जब से तुमसे प्यार हुआ है


दुश्मन सब संसार हुआ है।


समाज के डर से यह खेल रुक तो नहीं सकता ,अतः चोरी-चोरी चुपके- चुपके आगे बढ़ने लगता है-


मुझको अपराधी ठहराया


प्रीति रतन का चोर बताया


मेरे अपनों का भी मुझसे


बदला सा व्यवहार हुआ है।


टीवी, सिनेमा,मोबाइल हर तरफ कामुक प्रेम का दृश्य आम है;फिर भी इस संबंध में सम्यक और स्वस्थ वातावरण के निर्माण की कोई विशेष चिंता न तो समाज को है और न सरकार को। अन्यथा अश्लील साइट्स पर अभी तक प्रतिबंध लग गया होता।


होना यह चाहिए कि काम और प्रेम के संबंध में नई पीढ़ी को ज्ञान और अनुभव माता-पिता या गुरु से मिलता ; लेकिन जेनरेशन गैप इतना बड़ा हो गया है कि इस संबंध में घर में या शिक्षालयों में बात तक नहीं होती। अतः शेयरिंग और मार्गदर्शन इस संबंध में समवयस्कों के होते हैं -


अंधे अंधा ठेलिया,


दोनों कूप पड़ंत।


जब नई पीढ़ी गलत रास्ते पर आगे निकल जाती हैं तो समाज की भूमिका संभालने की बजाय हर तरह की बाधा खड़ी करने वाली होती है। छोटी सी बात को बहुत बड़ा बना करके प्रस्तुत किया जाता है। ऐसा रूप दिया जाता है कि पुरानी पीढ़ी में ऐसी घटनाएं कभी होती ही नहीं थी। यह बात सरासर झूठ है। दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी अभिज्ञानशाकुंतलम् में पढ़ाई जाती है किंतु जीवन में घट जाए तो सर पर आसमान उठा लिया जाता है-


किताबों में छपते हैं मोहब्बत के किस्से


हकीकत की दुनिया में मोहब्बत नहीं है।


मामला ऑनर किलिंग तक पहुंच जाता है। जाति,धर्म,क्षेत्र इत्यादि के नाम पर कई प्रकार की इज्जत की दीवारों में प्रेमियों को जिंदा चिनवा दिया जाता है।


मेरी सहानुभूति नई पीढ़ी के साथ है क्योंकि वे जगत के काम और प्रेम की धारा में न चाहते हुए भी खींच लिए जाते हैं। ऊपर से आज की इंटरनेट की दुनिया इस आग को भड़काने में पेट्रोल की भूमिका निभाती है। _परिवेश में गुरुकुल सा कोई वातावरण नहीं है। सादगी और सदाचरण से भरा व्यक्तित्व सेलिब्रिटी नहीं है; फिर चरित्र की प्रेरणा किससे मिले और कैसे मिले? -


खिलौनों के बदले में बारूद दी


कि बच्चों में अब गुलफिशानी कहां?


जलाकर शम्मा पूछते हो मुझसे,


पतंगों की अब जिंदगानी कहां??


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹