गरीबी सोच की
February 18, 2021संवाद
"गरीबी सोच की"
एक मां अपनी बेटी के साथ कन्या महाविद्यालय में मिलने आई। मां-बेटी का निवेदन यह था कि पुस्तकालय से प्रथम वर्ष की किताबें दिलवा दें। हमने कहा- मौलिक पुस्तकें तो खरीद लो। पुस्तकालय से विशेष रेफरेंस पुस्तकें इश्यू करा कर पढ़ लेना।
मां-बेटी ने कहा कि कमाने वाले घर के मालिक की मृत्यु हो जाने के कारण हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है।
मां-बेटी दोनों के हाथ में स्मार्टफोन था और दोनों के कपड़े गरीबी की सूचना नहीं दे रहे थे।संवेदना व्यक्त करते हुए मैंने घर के हालात जाने तो पता चला कि अपना मकान है और अपनी एक दुकान भी।
मैंने बेटी से पूछा कि तुम्हारे पास कितने ड्रेस हैं? सकुचाते हुए उसने कहा कि यही कोई दस जोड़ी। हमने कहा कि थोड़ी गहराई से सोचो।एक विषय की सारी किताबें ₹500 के अंदर में आ जाती हैं। लेकिन एक जोड़ी कपड़े इससे दोगुने दाम में मिलते हैं। किसी विशेष अवसर के लिए कपड़े मांग कर काम चला लें, ऐसा हम नहीं सोचते। किंतु किताबें लाइब्रेरी से या दूसरे से मांग कर काम चला लें, ऐसी सोच रखते हैं।
मैंने बड़े शांत भाव से मां-बेटी दोनों से पूछा- मौलिक पुस्तकें खरीदने के लिए वास्तव में पैसे की कमी है या सोच की?
दोनों ने स्वीकार किया कि स्कूल में भी किताबें मांगकर या सेकंड हैंड खरीद कर हमने काम चला लिया-
उजाले इस कदर बेनूर क्यूँ हैं?
किताबें जिंदगी से दूर क्यों हैं?? मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि वागड़ में इतनी हरियाली ,इतनी उपजाऊ भूमि,इतनी जल की प्रचुरता;फिर भी यह शैक्षिक दृष्टि से राजस्थान का सबसे पिछड़ा क्षेत्र क्यों है? इस मुलाकात में मुझे उसका उत्तर मिला।
हमने कहा कि आप सोच बदलिए। तन को सजाने के लिए हम जितना खर्चा करते हैं ,उसका आधा भी मन को सजाने के लिए पुस्तकें खरीदने पर नहीं करते हैं। जिसके कारण पासबुक की विकृति में यहां की युवा पीढ़ी फंस चुकी हैं। फलत: डिग्री तो बढ़ती जाती है किंतु योग्यता नहीं बढ़ती। कितने भी रंगीन कपड़े हों, उनसे जिंदगी में कोई रौनक नहीं आती। जो भी लोग गरीबी के दुष्चक्र से बाहर हुए हैं, उनके जीवन में अच्छी पुस्तकों और अच्छे शिक्षकों के सत्संग ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।-
बिहार के मिथिलांचल में कभी जगद्गुरु शंकराचार्य दक्षिण से चलकर वहां के विद्वान् मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ करने के लिए पहुंचे थे। उस इलाके में पुस्तक और पढ़ाई से इतना लगाव है कि बहुत गरीब परिवार से मेरे कई साथी बहुत उच्च-पदों पर पहुंचे। उनकी संगति से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और सबसे बड़ा मंत्र उनकी सफलता का पता चला कि अच्छी पुस्तकों से अच्छा व बड़ा कोई मित्र नहीं। उस इलाके में एक नारा लोकप्रिय है-
"दो रोटी कम खाएंगे ,
किताब नई लाएंगे।।"
यह सोच अमीरी की सोच (Rich in thinking) है।पासबुक और किताबें जुगाड़ करके पढ़ने वाली सोच को मैं गरीबी की सोच(Poor in thinking) कहता हूं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹