'संवाद'


सड़क हादसों का जिम्मेदार कौन?


MPके सीधी में बस के नदी में गिरने से जल-समाधि 51 जिंदगियों ने ले ली, जिसमें अधिकतर विद्यार्थी परीक्षा देने के लिए परीक्षा केंद्र पर जा रहे थे।


दुर्घटना के कारणों की जांच चलती है जो कि सिर्फ लीपापोती होती है। लेकिन जो कारण प्रत्यक्षदर्शियों ने बताए हैं, वो सबक लेने जैसा है। खबर है कि ड्राइवर ने परीक्षा केंद्र पर जल्दी पहुंचाने के लिए व्यस्ततम सड़क मार्ग को छोड़कर दूसरा संकीर्ण रास्ता चुना, जिसपर बस अनियंत्रित होकर नदी में गिर गई। ड्राइवर का कहना है कि बस में कुछ आवाज हुई जिसके बाद बस सीधे नदी में गिर गई।


अपने नाती पोते को खोने वाले एक वृद्ध ने गंभीर आरोप लगाते हुए हृदय विदारक स्वर में कहा कि सड़क निर्माण में करोड़ों रुपए भ्रष्टाचार में खा लिए जाते हैं और जान जाने पर कुछ रुपए मुआवजे के रूप में दे दिए जाते हैं। इस मुआवजा राशि से क्या घरों के चिराग लौटाए जा सकते हैं?


प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटना में मरने वालों की संख्या विश्वयुद्ध में मरने वालों की संख्या से ज्यादा हो रही है। इसमें सड़क को दोष दिया जाए या गाड़ी को दोष दिया जाए या ड्राइवर को? इस प्रश्न पर विचार करते हुए संस्कृत का श्लोक मुझे बहुत विचारणीय लगा;इसमें कहा गया है कि


आत्मानं रथिनं विद्धि,शरीरं रथमेव तु।


बुद्धिं तु सारथिं विद्धि,मन: प्रग्रहमेव च।।


अर्थात् आत्मा को रथी जानो, बुद्धि को सारथी , मन को लगाम और इंद्रिय को घोड़े और विषय को मार्ग। जब तक आत्मा रूपी रथी और बुद्धि रूपी सारथी का नियंत्रण मन रुपी लगाम पर रहता है,तब तक कोई खतरा नहीं।


किंतु जब मालिक ज्यादा रुपयों के लालच में ज्यादा सवारी बिठा कर जल्दी से ज्यादा मार्ग कवर करने हेतु ड्राइवर को आदेश देता है और ड्राइवर भी किसी भी रास्ते से अनियंत्रित गति द्वारा मंजिल प्राप्त कर लेना चाहता है तो सारे यात्री राम भरोसे हो जाते हैं।


और यदि यात्री भी कम से कम समय में गंतव्य पर पहुंचना चाहते हैं और उसके लिए दबाव बनाते हैं तो फिर राम भी साथ छोड़ देते हैं-


मंजिल-मंजिल करती दुनिया,


मंजिल है कोई शै नहीं।


जिसको देखा चलते देखा,


पहुंचा तो कोई है नहीं।।


नहीं पता लोग दुनिया में इतनी तीव्र गति से चलकर कहां पहुंचना चाहते हैं और इतना ज्यादा पैसा कमा कर क्या पाना चाहते हैं?


जल्दी और ज्यादा के चक्कर में उस गंतव्य पर व्यक्ति पहुंच जाता है,जहां से लौटना ही नहीं होता और परिजनों का जीना बहुत मुश्किल हो जाता है-


जिंदगी जीना बहुत दुश्वार हो गया


अब तो हर पल तेरा इंतजार हो गया।


जीवन अपने आप में मार्ग भी हैं और मंजिल भी।अत:-


हर मौसम में नीरव और निश्चिंत रहना


वसंत की नदी की भांति मंद-मंद बहना।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹