ज्यादा नंबर लाने वाले विद्यार्थी विज्ञान लेते हैं और कम नंबर वाले कला;ऐसा क्यों?
February 28, 2021'संवाद'संदर्भ राष्ट्रीय विज्ञान दिवस
विज्ञान और कला
प्रश्न:- "ज्यादा नंबर लाने वाले विद्यार्थी विज्ञान लेते हैं और कम नंबर वाले कला;ऐसा क्यों?"
प्रिय विद्यार्थी!तुम्हारे प्रश्न में कुछ हद तक सच्चाई है किंतु पूरा सत्य नहीं। निश्चित ही यह युग विज्ञान का युग है। विज्ञान के क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं ज्यादा दिखाई देती हैं। विज्ञान के आविष्कारों ने हमारे जीवन में अभूतपूर्व क्रांति लाई हैं। लेकिन सुविधाओं के मामले में ही, सुख के मामले में नहीं।
विज्ञान ने जीवन को बहुत सुविधापूर्ण बना दिया; किंतु क्या जीवन उतना ही ज्यादा सुखपूर्ण भी बना है?
इस प्रश्न का उत्तर जब जीवन में ढूंढते हैं तो नकारात्मक जवाब आता है।
क्यों? क्योंकि विज्ञान कला के बिना अंधा है और कला विज्ञान के बिना लंगड़ी।
एक तरफ विज्ञान ने हमें परमाणु शक्ति दी किंतु अंधापन ने उससे हिरोशिमा को अंजाम दिया। दूसरी तरफ कला कितना भी सौंदर्यबोध दे दे किंतु विज्ञान द्वारा जुटाई गई सुविधाएं न हो तो महज काल्पनिक सुख होगा, वास्तविक नहीं।
भेड़चाल के कारण अधिकतर विद्यार्थी सबसे पहले विज्ञान को अवश्य चुनते हैं किंतु इससे कला का महत्व कम नहीं हो जाता।
आज जरूरत है वैज्ञानिक मस्तिष्क की और कलात्मक हृदय की। विज्ञान मकान(House) बना सकता है किंतु उसको घर(Home)की शक्ल तो कलात्मक हृदय ही देगा। प्रसिद्ध कहानी है कि जंगल में आग लगी तो अंधे और लंगड़े की दोस्ती ने उनदोनों को आग से बचा लिया। विज्ञान ने बहुत प्रकार की शक्तियां दे दी किंतु उन शक्तियों के सदुपयोग करने की मति तो कला से आएगी। अतः राष्ट्रीय विज्ञान दिवस जैसे माध्यमों से वैज्ञानिक सोच विकसित करने की कोशिश की जाती है ताकि हम अंधविश्वासों से मुक्त हो सकें तथा वस्तुओं में छिपी हुई संभावना को पहचान कर उन्हें अपने जीवन में उपयोग कर सकें। लेकिन इसके साथ कलात्मक सोच को विकसित करना भी जरूरी है जो इंसानों में छिपी हुई संभावना को पहचान कर इस जीवन को स्वर्ग बना सके।
अतः विज्ञान एवं कला का सुंदर समन्वय ही सुविधापूर्ण जीवन में सुख भर सकता है-
"जीवन का फूल यूँ खिलता रहे कि कला भी हो विज्ञान भी हो,
उद्यान भी पास में बचा रहे और रहने का मकान भी हो।"
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹