संवाद


"न्याय की दिशा"


जस्टिस राणा का फैसला और दिशा रवि का केस कई दृष्टियों से न्याय की दशा और दिशा को निर्धारित करने वाला है।


सरकार से असहमति और उसकी आलोचना देश विरोधी कदम तो हरगिज़ नहीं है;वह सरकार विरोधी भी नहीं है।


दुर्भाग्य से एक ऐसे वातावरण का निर्माण हुआ है,जिसमें आलोचना के प्रति असहिष्णुता झलक रही है।


सरकार को तो अपनी आलोचना का सहर्ष स्वागत करना चाहिए और हो सके तो निंदक को भी सहना चाहिए। आलोचक तो नीतियों की आलोचना करता है किंतु निंदक तो नीति- निर्माताओं की भी; फिर भी कबीरदास कहते हैं-


निंदक नियरे राखिए,आंगन कुटी छवाय


बिन साबुन पानी बिना,निर्मल करे सुभाय।


लेकिन बहुमत और Absolute- Power का स्वभाव ऐसा हो जाता है कि निंदक तो उसे एकदम बर्दाश्त नहीं होते और आलोचक भी फूटी आंख नहीं सुहाते।


लेकिन भारत की सांस्कृतिक परंपरा ऐसी रही है कि- विषय:विशयश्चैव पूर्वपक्षस् तथोत्तरम् अर्थात् विषय का प्रतिपादन होते ही विशय (संशय) के लिए मंच खुला रहता था। फिर पूर्वपक्ष तथा उत्तरपक्ष को सुनने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाता था। जस्टिस राणा ने इसी बात को उद्धृत किया कि ऋग्वेद के ऋषि कहते हैं कि- आ नो भद्रा:क्रतवो यंतु .. अर्थात् किसी भी दिशा से आने वाले अच्छे विचार का स्वागत करो। सजग नागरिक सरकार की अंतरात्मा के रखवाले होते हैं। आलोचना से अहंकार को चोट पहुंच सकती हैं, आत्मा को नहीं।


अनुच्छेद 19 की व्याख्या में जज राणा का यह कहना कि बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में वैश्विक-श्रोता खोजने का भी अधिकार निहित है; यह अभिव्यक्ति के एक नए आयाम को उजागर करता है।


यह पूरा मामला किसी की जीत और हार का नहीं है बल्कि सजग नागरिक को शक्तिशाली राज्य के विरुद्ध संरक्षण देने का है।


एक तरफ मौलिक कर्तव्यों में वैज्ञानिक चेतना के विकास की बात कही गई है तो दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भयभीत व सीमित करने का प्रयास हो रहा है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका ने अपने निर्भीक और दूरदृष्टिपूर्ण निर्णय से सजग नागरिक को मूकदर्शक न बने रहने का संदेश दिया है।


आगे सवाल यह भी उठेगा कि पर्याप्त सबूतों के अभाव में जिनको जेलों में बेवजह कई माह,साल गुजारने पड़े हैं ;उनकी प्रताड़ना के जिम्मेवार लोगों के बारे में न्याय की दिशा क्या होती है?


एक बार पूर्व राष्ट्रपति डॉ.कलाम से पूछा गया कि महाभारत का कौन सा पात्र आपको सबसे प्रिय हैं? एक वैज्ञानिक का जवाब चौंकानेवाला और निराला था- महामंत्री विदुर मेरी नजर में सबसे महत्वपूर्ण पात्र हैं क्योंकि उन्होंने हर गलत जगह पर राज्य के हित में सही पक्ष को रखने का साहस दिखाया जबकि द्रोणाचार्य,कृपाचार्य और भीष्म पितामह तक कई जगह पर विवश दिखे।


अपनी सरकार से प्रश्न पूछने का और अपनी बात कहने का हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और मौलिक कर्तव्य भी-


जुबां तो खोल ,आंख तो मिला,जवाब तो दे।


मैं कितनी बार लुटा हूं , इसका हिसाब तो दे।।


युवा भारत के युवा होने का सबूत वैज्ञानिक और निर्भीक चेतना वाले नागरिक देते हैं।


शिष्य-गुरु संवाद से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹