'संवाद'


शक्ति शिव को वरण करती हैं क्योंकि शिव ने समुद्र-मंथन से उत्पन्न हुए विष को इस तरह से पिया कि स्वयं की भी रक्षा कर ली और संसार की भी। नीलकंठ की कला तो देखिए जहर को न गले के नीचे उतरने दिया और न बाहर फैलने दिया।


अमृत पाकर भी राहु दो भागों में काटा गया- राहु और केतु; किंतु विष पीकर भी शिव देवों में महादेव हो गए।


परिवेश के आत्म-मंथन से अमृत की संभावना कहीं दिखाई नहीं देती और सर्वत्र विष-वमन करते हुए नेतृत्व दिखाई दे रहे हैं। Power में आने के लिए जहरीली जुबान के द्वारा 'बांटो और राज करो' की नीति अमल में लाई जा रही है। मीडिया विवादित बयानों को घर-घर और जन-जन तक पहुंचा कर वातावरण को और विषाक्त बना रहा है।


जिस बंगाल की धरती ने कला और साहित्य का आकाश छुआ,वहां पर हिंसा और भाषा की दरिद्रता को देख कर बहुत दुख हो रहा है। गाली और गोली यदि बोली में प्रमुख हो जाए तो नवजागरण की इस धरती का इससे बड़ा अपमान क्या होगा? एक तरफ पूजा स्थल पर माथा टेकने की तस्वीरें आ रही हैं और दूसरी तरफ मंदिर से आकर प्रसाद में विष बांटा जा रहा है। भगवान के दर्शन के बाद इंसान हैवान की बोली कैसे बोल सकता है? -


सुधा कल्पना मात्र, गरल का दावा सोलह आने सच है,


कभी किसी ने चखा न देखा केवल नाम चला आता है।


पर विष बिकता चौराहे पर


जो खाता है मर जाता है।।


भारतीय संस्कृति में आदि-काव्य रामायण के अनुसार राम ने लंका विजय की कामना से शिवलिंग की स्थापना हेतु यजमान के रूप में अपने प्रतिपक्षी रावण का चयन किया और रावण ने भी उस पूजा को संपन्न कराने में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाई। महाभारत युद्ध के पहले बैठकर भीष्म पितामह की अगुवाई में कौरवों और पांडवों ने युद्ध के नियम निर्धारित किए थे। जब तक भीष्म लड़ते रहे तब तक नियमों का पालन होता रहा और उसके बाद महारथी कर्ण ने भी सूर्यास्त होते ही अपने अंतिम प्राणघातक बाण को अर्जुन पर चलाने से रोक लिया। इस कारण तो भगवान कृष्ण ने भी दानवीर कर्ण की भुरी-भुरी तारीफ की।-


जहां पर चला करते थे बाण भी ईमानदारी से ,


वहां की अब जुबान लाचार क्यों है सोचना होगा?


हमारा मर गया किरदार क्यों है सोचना होगा?


आज उपेक्षित वाग्व्यवहार क्यों है सोचना होगा??


शब्द-सौष्ठव और भाषा-सौष्ठव पर काम करने की बहुत बड़ी चुनौती प्रस्तुत हुई है। "चुनाव लड़ना" जैसा शब्द लोकतांत्रिक-भाषा नहीं है। इसकी जगह "चुनाव करना" जैसे शब्दों का उपयोग किया जाना चाहिए।


लड़ने के फेरे में प्रत्याशी और समर्थक अपनी मर्यादा भूलते जा रहे हैं क्योंकि"Everything is fair in love and war" का सिद्धांत उनका पथ प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन यह पंक्ति पाश्चात्य संस्कृति की है। राजनीतिक नेतृत्व की यह सोच बनी है कि उच्च स्तर की भाषा से जनमानस को आंदोलित नहीं किया जा सकता। अतः कम समय में चुनाव जीतने के लिए वे निम्न स्तर की भाषा पर उतर आए हैं।


लेकिन अमृत बांटने को न हो तो जहर को बांटना, यह कोई शिवत्व नहीं।


महाशिवरात्रि का दिवस यह संदेश देता है कि जहरीले बोल को कंठ में ही रोक लिया जाए। अन्यथा दिलों की दूरियां इतनी बढ़ जाएगी कि उसे पाटने में सदियां लग जाएगी।


'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ. सर्वजीत दुबे महाशिवरात्रि की शुभकामनाओं सहित 🙏🌹