कोप कम,कृपा ज्यादा
March 12, 2021संवाद
"कोप कम,कृपा ज्यादा"
दोनों पैर की हड्डियां टूट गई हो, असहनीय दर्द पूरी तरह से महसूस हो रहा हो और अन्य कई बातें मन के प्रतिकूल हो रही हो; फिर भी अभी तुरंत ऑपरेशन से निकला व्यक्ति इस घटना में भगवान का 'कोप कम,कृपा ज्यादा' बता रहा हो तो इसे क्या कहिएगा? मैं तो इसी को श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव कहता हूं, जिसका जगत से लोप होता जा रहा है-
मसर्रतों के खजाने ही कम निकलते हैं,
जिसका भी दिल खोलो,वहां गम निकलते हैं।।
लोगों के पास सारी सुख-सुविधाएं होती हैं,फिर भी शिकायतों का पारावार नहीं।
यहां अपनी कोई गलती नहीं क्योंकि खड़ी गाड़ी में अनियंत्रित स्पीड वाला गलत साइड से आकर इतना बड़ा जख्म दे गया लेकिन घायल व्यक्ति परमात्मा की कृपा का कायल है। उनके शब्दों में-" अभी मेरे हाथ सुरक्षित हैं,जिनसे मैं लिखने का काम कर सकता हूं, कान सुरक्षित हैं जिनसे भगवत्चर्चा सुन सकता हूं, आंखें सुरक्षित हैं जिनसे खुला आकाश,उगता सूरज और उड़ते पंछी को देख सकता हूं और सबसे बड़ी बात कि वह जीवन सुरक्षित है जिसे अपनों के साथ जी सकता हूं..... ये बातें सुनकर मुझे 'सम्यक दर्शन' का मतलब पता चला।
बातचीत के दौरान इनके मुख से लापरवाही से गाड़ी चलाने वाले के बारे में एक भी अपशब्द नहीं निकला। इसे वे दुर्घटना नहीं बल्कि विधि का विधान बता रहे थे जिसमें परमात्मा अपनी गलतियों का प्रायश्चित करने के लिए एक अवसर देता है और ऊपर की तरफ आंख उठाने के लिए एक मौका।
ये शख्स कष्ट में अवश्य हैं लेकिन दुख में नहीं हैं क्योंकि सुख-दुख मन की व्याख्या पर निर्भर करता है। जिसके मन में यह धारणा हो कि "दुनिया में हर कार्य मंगलकारी है। अपनी छोटी दृष्टि के कारण जिसे हम अमंगल समझते हैं उसे व्यापक दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि उसमें भी कुछ न कुछ मंगल छिपा हुआ है।" उसे दुखी करना मुश्किल है क्योंकि उसने अपने सुख के सारे दरवाजे खोल रखे हैं। यह भगवत्कृपा के बिना संभव नहीं कि ऐसी विपत्ति में किसी को इतनी संपत्ति दिखाई दे जाए।
मुझे तो इस मोड़ पर एक फकीर की कहानी याद आ गई जिसके बेटे की दुर्घटना में पैर टूट गए थे। लोग मिलने आए और परमात्मा को कोसने लगे कि भगवान भी कितना अन्याय करता है। उस फकीर ने कहा कि बस इतना ही कहो कि पैर टूट गया है। परमात्मा को कोसना बंद करो और यह अच्छा हुआ या बुरा हुआ तुम कुछ नहीं जानते ,ऊपर वाला जानता है। कुछ दिन के बाद उस राज्य में अनिवार्य सैन्य सेवा नियम के तहत सारे नौजवानों को पकड़कर युद्ध में भेज दिया गया और सभी मारे गए। सिर्फ़ फकीर का बेटा गांव में बचा-
इस विशद विश्व प्रवाह में किसको नहीं बहना पड़ा
सुख-दुख हमारी ही तरह किसको नहीं सहना पड़ा।
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूं मुझ पर विधाता बाम है
चलना हमारा काम है,चलना हमारा काम है।।
मुझे ऐसा लगा कि विषम परिस्थितियों में भी ऐसी सोच रखने वाले इस शिक्षक की दृष्टि समाज के लिए अनुकरणीय और अनुसरणीय है; अतः सबके समक्ष यह बात अवश्य लाई जानी चाहिए ताकि अमंगल में भी मंगल देखने की दृष्टि सबको प्राप्त हो सके।
सौभाग्य से महाशिवरात्रि के दिन यह दुर्लभ संवाद मैंने रिकॉर्ड भी कर लिया जिसे आप चाहें तो सुन सकते हैं क्योंकि विषम परिस्थितियों के सम्यक पान की कला को ही शिवत्व कहते हैं। ☝️👇🏻
'शिष्य-गुरु संवाद' से डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹