विद्यार्थी की कक्षा में उपस्थिति की अनिवार्यता
March 14, 2021संवाद संदर्भ "विद्यार्थी की कक्षा में उपस्थिति की अनिवार्यता" विषय पर पूर्व कुलपति सोडाणी सर का लेख।
शिक्षालय और क्लास की ओर लौटो"- जनजातीय बहुल क्षेत्र बांसवाड़ा में ऑनलाइन शिक्षा से लाभान्वित होने वाले विद्यार्थियों की संख्या नगण्य है। कोरोना काल में वीडियो बनाने में और व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर उसे अपलोड करने में शिक्षकों ने अपने आप को शत-प्रतिशत झोंक दिया। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऑनलाइन क्लासेज भी शिक्षण संस्थानों में चलाई गई।
किंतु जिन विद्यार्थियों के लिए साधनों के अभाव में भी शिक्षकों ने यह तपस्या की, उसका लाभ विद्यार्थियों तक बहुत कम पहुंचा।
अब जब विद्यार्थी क्लासेज में बड़ी संख्या में आ रहे हैं,तब वास्तविकता का पता लगने पर आश्चर्य होता है। उसके प्रमुख कारण हैं-
(1) कई विद्यार्थियों के पास स्मार्टफोन का न होना।
(2) अधिकतर विद्यार्थियों के पास पूरे परिवार के लिए एक स्मार्टफोन होना।
(3) नेट कनेक्टिविटी की सुविधा न होना।
(4) भेजे गए वीडियो या नोट्स को स्वयं से पढ़ कर समझ पाने में असमर्थ होना।
(5) घर के सदस्यों का मजदूरी के लिए अन्यत्र व्यस्त रहना।
जब इन कारणों से अवगत हुआ और बदले परिदृश्य में विद्यार्थियों को अपने शिक्षक और क्लास के लिए बेचैन देखा तो मुझे शिक्षक और क्लास टीचिंग की महिमा और आवश्यकता का भान हुआ।
शिक्षक विद्यार्थियों का स्तर देखकर किसी बात को समझाने के लिए शब्दों का और घटनाओं का चयन करता है जो कि वह वीडियो में या ऑनलाइन क्लासेज में नहीं कर पाता। क्लास टीचिंग में विस्तारपूर्वक किसी भी विषय को समझाने का शिक्षक द्वारा प्रयास किया जाता है जो किसी ट्यूशन या कोचिंग पर नहीं किया जाता। आज की बदली परिस्थिति में यदि विद्यार्थियों का सर्वे करवाया जाए कि कितने विद्यार्थी ऑनलाइन क्लास के पक्ष में हैं और कितने क्लास-टीचिंग के पक्ष में; तो मुझे लगता है कि चौंकाने वाले आंकड़े सामने आएंगे।
अब ऐसी स्थिति में विचारणीय विषय यह है कि शिक्षालय में क्लास-टीचिंग जो कमजोर पड़ गई थी, उसे सुदृढ़ किया जाए या उसका ऑनलाइन क्लास जैसा कोई विकल्प ढूंढा जाए?
मेरे जीवन का अनुभव कहता है कि शिक्षालय और क्लास-टीचिंग विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के लिए आज भी सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। ऑनलाइन क्लासेज या ट्यूशन या कोचिंग पूरक तो हो सकते हैं,मुख्य कभी नहीं।
कॉलेज में एडमिशन,इलेक्शन और एग्जामिनेशन के समय जो संख्या दिखाई देती है, उसकी तुलना में क्लास-टीचिंग में उपस्थित होने वाले विद्यार्थियों की संख्या निश्चित ही बहुत कम है। इसके लिए अनेक कारण जिम्मेदार हैं,जिसमें शिक्षकों की कमी, नियमित क्लासेज का न होना और विद्यार्थियों की पारिवारिक स्थिति इत्यादि। लेकिन सबसे बड़ा सत्य है कि क्लासेज में नियमित आने और शिक्षकों के संपर्क में सदैव रहने वाले विद्यार्थी ही टॉपर बनते हैं और संस्थान का नाम ऊंचा करते हैं।
शिक्षालय कार्यालय या सूचनालय में तभी तब्दील होते हैं,जब क्लास- टीचिंग कमजोर पड़ जाती है। फिर समितियों की संख्या बढ़ जाती हैं और कागजों का ढेर।
क्लास के द्वारा शिक्षक शिक्षार्थी से जुड़कर समाज तक पहुंचता था और समाज का दबाव सरकार पर पड़ता था। इससे शिक्षालय की गौरव-गरिमा बढ़ती थी और शिक्षकों का आत्मविश्वास भी।
कोरोना के बाद शिक्षालयों में और क्लास में आने वाले विद्यार्थियों की अच्छी संख्या बता रही है कि उनकी प्यास पढ़ने के लिए और अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए बढ़ी हैं। पुस्तकों की दुनिया में प्रवेश कराकर विषय को सहज और सरस बनाने में शिक्षक का कोई सानी नहीं। ऑनलाइन शिक्षा के अनुभव ने शिक्षालय और क्लास-टीचिंग का महत्व और बढ़ा दिया।
ऐसे में संस्था-प्रधान का यह गुरुतर दायित्व बनता है कि प्रत्येक कक्षा में विद्यार्थियों के लिए शिक्षक की व्यवस्था करें और नियमित कक्षाओं के संचालन को सुनिश्चित करें।
गैर-शैक्षणिक कार्यों में शिक्षकों को न लगाया जाए। ऊपर से भी क्लास की प्रभावी मॉनिटरिंग की व्यवस्था की जाए।
विद्यार्थी और समाज जुड़कर शिक्षकों की मांग सरकार से करें ताकि युवा पीढ़ी पढ़ाई की दुनिया में गति कर सकें। अन्यथा असामाजिक गतिविधियां माहौल खराब कर सकती है। क्लास में शिक्षकों के पास नहीं आने वाली पीढ़ी से सरकार को भी लॉ एंड ऑर्डर की समस्या उत्पन्न होगी।
अतः सभी के हित में है कि शिक्षालय और क्लास-टीचिंग के महत्व को समझें और अनुकूल परिस्थितियां बनाएं।
जिंदगी को बनाने वाले और बदलने वाले शिक्षक को अन्य गतिविधियों में लगाकर युवा पीढ़ी तथा देश को खतरे में न डाला जाए।
माननीय पूर्व कुलपति (जीजीटीयू) सोडाणी सर का यह लेख "विद्यार्थी की कक्षा में उपस्थिति की अनिवार्यता" बहुत ही प्रासंगिक और बड़े महत्व का है। सर के अधीन अकादमिक-प्रभारी के रूप में मैंने विश्वविद्यालय में नियमित कक्षाओं के साथ एक अभिव्यक्ति कौशल विकास की क्लासेज चलवाने में सफल रहा। सर के मार्गदर्शन में जीजीटीयू ने रीट कोचिंग की भी व्यवस्था नियमित क्लासेज के बाद के समय में की थी।
मुझे तो समाज की बहुत सारी समस्याओं के निदान में शिक्षालय और शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है। अपनी बात के सबूत के रूप में भीलवाड़ा के एक गांव को मैं उद्धृत करना चाहूंगा जहां शिक्षालयों में शिक्षकों की पूर्ण उपलब्धता होने पर अपराध रिकॉर्ड शून्य पाया गया। यह रिपोर्ट कुछ दिन पहले समाचारपत्र में छपी थी।
मैं सभी से निवेदन करता हूं कि विद्यार्थी की कक्षा में उपस्थिति की अनिवार्यता को सफल बनाने के लिए इसे जनांदोलन का रूप दिया जाए। बहस के लिए महत्वपूर्ण विषय और अच्छी बात का सूत्रपात करने के लिए शिक्षाविद सोडाणी सर का बहुत-बहुत आभार।
हुए इस तरह खम जमाने के हाथों,
कभी तीर थे अब कमां हो गए हम
न रहबर कोई न रफीके सफर है,
यह किस रास्ते पर रवां हो गए हम।।
खासकर गरीब विद्यार्थियों की वस्तुस्थिति को समझते हुए शायर यही कह रहा है कि जमाना सीधा तीर को टेढ़ा कमान बना दिया। शिक्षालय और शिक्षक के बिना पीढ़ियां गलत रास्तों पर चली जाएंगी। ज्यादा देर हो जाए, इसके पहले सभी को सचेत हो जाना चाहिए।
'शिष्य-गुरु संवाद केंद्र' से
डॉ सर्वजीत दुबे🙏🌹