संवाद


"आनंदम् की चुनौती"


उचित देश-काल के अभाव में श्रेष्ठतम आईडिया भी समाधान की जगह समस्या बन जाता है। विद्यार्थियों में द जॉय ऑफ गिविंग अंकुरित हो,प्रत्येक शिक्षक दिलों-जान से इसे चाहता है। किंतु जनजातीय क्षेत्र बांसवाड़ा जैसे स्थान के गरीब आदिवासियों के पास अपनी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है। दूर जाकर मजदूरी करके दो जून की रोटी का जुगाड़ करते हैं। कोरोना की विकट परिस्थिति से बचकर जब ऐसे विद्यार्थी कॉलेज में आ रहे हैं तो पढ़ाई के अलावा उनके मन-मस्तिष्क में अन्य कुछ भी नहीं सूझ रहा। स्मार्टफोन के अभाव में ऑनलाइन शिक्षा का उन्हें रत्ती भर भी लाभ नहीं मिला। अतः क्लास में पढ़कर अपने शिक्षक के सहयोग से विद्यार्थी अच्छे नंबर से परीक्षा पास करना चाहते हैं। परीक्षा की तैयारी का उनके पास समय बहुत कम है और शिक्षक तथा क्लास-टीचिंग के अलावा अन्य कोई सहारा नहीं है।


बार-बार आनंदम् की सूचना दिए जाने पर भी वे कोई ध्यान नहीं दे रहे। छात्राओं के अभिभावकों का कहना है कि पढ़ाने का काम कॉलेज कर दे, इतना ही काफी है; समाज सेवा का काम बाद में होते रहेगा। सामूहिक गतिविधियों के नाम पर हम अपनी बेटी को क्लास के अलावा और कहीं भी भेजने की स्थिति में नहीं है। उस पर से ग्रुप बनाना,गूगल फॉर्म भरना इत्यादि बातों के लिए हमारे पास न तो साधन है और न सुविधा। परीक्षा का और स्कॉलरशिप का फॉर्म भरने के लिए तो ईमित्र से ज्यादा पैसा देकर भी काम चला लेते हैं किंतु आनंदम् की योजना के लिए अपने बच्चों को स्मार्टफोन देना हमारे बूते के बाहर की बात है।


एक तो कॉलेज में तीनों विषयों के टीचर नहीं उपलब्ध है और उस पर से उपलब्ध शिक्षकों को क्लास के समय में अन्य कार्यों में लगा दिया जा रहा है। ऐसे में हमारे बच्चों का भविष्य क्या होगा?


देश-काल की इस विकट परिस्थिति में शिक्षक धर्मसंकट में पड़ा है। यदि शिक्षक-वर्ग आनंदम् योजना को सफल नहीं बना पाता है तो इतनी अच्छी योजना की विफलता का मलाल उसके हृदय में सदा रहेगा और यदि इसे सफल बनाने के लिए विद्यार्थियों पर विशेष दबाव बनाता है तो उनकी पढ़ाई निश्चितरूपेण बाधित होगी। परीक्षा का समय नजदीक है और परीक्षार्थियों की निर्धनता तथा विवशता भी आंखों के सामने हैं।


इस धर्मसंकट का हल क्या है? शिक्षार्थी व समाज की सोच एक तरफ है और सरकारी आदेश दूसरी तरफ। इन दो पाटों के बीच में शिक्षक पिस रहा है। कुछ प्रश्न हृदय को मथे जा रहा है- (1) "क्या हम स्वयं के बच्चे को परीक्षा के समय में सेवा जैसे किसी कार्य में लगा देते हैं?"


(2) क्या परीक्षा के सर पर होने की स्थिति में सीमित संसाधनों में विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम पूरा कराए जाने के साथ आनंदम् योजना को सफल बनाया जाना संभव है?


ये यक्ष-प्रश्न मुझे परेशान किए जा रहे हैं।


यदि कोरोना का संकट नहीं होता और शिक्षकों की कमी नहीं होती तो पर्याप्त समय होने पर आनंदम्-योजना सही मायने में आनंद लाती।


एक तरफ गरीब आदिवासियों को देखता हूं और दूसरी तरफ परीक्षा एकदम नजदीक देख रहा हूं तो मुझे कबीर याद आ रहे हैं-


"चींटी चाउर ले चली , बीच में मिल गई दार,


कहे कबीर दोउ ना सधै , एक ले दूजी डार।।


अर्थात् चींटी के मुंह में चावल का दाना था और बीच में दाल का दाना दिख गया तो धर्मसंकट उत्पन्न हुआ कि दोनों दानों को कैसे छोटे मुंह से ले चलूं? तब कबीर ने सुझाया कि दोनों एक साथ नहीं सध सकता। देश-काल के मद्देनजर हमें भी कोई चुनाव करना होगा।


'शिष्य- गुरु संवाद' से डॉ.सर्वजीत दुबे🙏🌹