संवाद


"नारी के प्रति दृष्टिकोण"


जब सिंधु और सानिया (मिर्जा, नेहवाल) खेल की मांग के अनुरूप बने छोटे कपड़ों में भारत का नाम रोशन करती हैं, दौड़ से लेकर जिमनास्टिक तथा कुश्ती तक में पीटी उषा से लेकर दीपा कर्माकर तथा साक्षी मलिक तक जब अंतरराष्ट्रीयओलंपिक स्पर्धा में भारत का तिरंगा झंडा लहराती हैं;तब कभी भी कपड़े पर ध्यान नहीं जाता बल्कि उनके करैक्टर और मानसिक दृढ़ता पर सबकी नजरें टिक जाती हैं।


विज्ञान के आविष्कारों के कारण यह दुनिया बदल चुकी है किंतु पुरुष प्रधान समाज की सोच उतनी गति से नहीं बदल रही।


अन्यथा करैक्टर या संस्कार कपड़े तक सीमित नहीं रहता किंतु जिस संस्कृति में ' न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति'-(मनुस्मृति), 'जिमि स्वतंत्र होहि बिगरहिं नारी'-( रामचरितमानस के श्री राम) के संदर्भ विशेष में कहे गए वाक्य हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे तब तक स्त्री का चरित्र-प्रमाणपत्र पुरुष द्वारा जारी किया जाता रहेगा।


गांधीजी संवेदनशीलता के कारण अपने आधे कपड़े त्याग कर अधनंगा फकीर कहला जाते हैं किंतु स्त्रियों के कपड़े किसी कारणवश कम हो जाए तो संस्कार खतरे में पड़ जाता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हरिदेव जोशी राजकीय कन्या महाविद्यालय,बांसवाड़ा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में जब मुझे वक्ता के रूप में बोलने को आमंत्रित किया गया तो मैंने विषय चुना- "नारी के प्रति दृष्टिकोण". जीवन का अनुभव बताता है कि नारी को कमतर समझने की भूल और उनके प्रति समाज का दृष्टिकोण विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है।


त्याग-तपस्या और प्रेम से सृष्टि को संवारनेवाली नारी का अहसास हर क्षण सर्वत्र होता है। मां खाना बनाती थी,हम खा लेते थे;बहनें कपड़े धोती थी,हम पहन लेते थे; जीवनसंगी घर की जिम्मेदारियां संभालती हैं तब हम समाज में पद-प्रतिष्ठा हेतु दौड़ पाते हैं।


ऋग्वेद का पुरुष सूक्त कहता है कि यह शरीर एक पुर (नगर) हैं जिसमें रहने वाली आत्मा ईश। यह आत्मा स्त्री और पुरुष में भिन्न नहीं है।


किंतु जब आध्यात्मिक संस्कृति के लोग तन और वस्त्र पर रुक जाते हैं तो ऐसे दृष्टिकोण पर क्रिया- प्रतिक्रिया स्वाभाविक है।


नारी के प्रति दृष्टिकोण पर विचार बनाने के लिए मैंने दर्शनशास्त्र के दो प्रोफेसरों से संपर्क किया और वे दोनों महिलाएं थीं। दोनों ने ही पुरुष प्रधान समाज की बेड़ियों को अपनी आत्मा की जंजीर न बनने दिया बल्कि अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बलबूते अपना स्थान बनाया। उनकी नजरों में कई पुरुष ऐसे मिले जिन्होंने आत्मा को ऊंचाईयां दी और कई नारी भी ऐसी मिली जिनकी दृष्टि पुरुष प्रधान सोच से आगे नहीं जा पाती थी; जो हमेशा सिखाती थीं कि लड़की होने के कारण धीमे बोलो, ऐसे कपड़े पहनो,ऐसे उठो-बैठो।


यह मामला सोच का है,नजरिए का है और दृष्टिकोण का है।


नारी के प्रति वस्तुवादी और भोगवादी दृष्टि कभी भी अध्यात्मिक पीढ़ी तैयार नहीं होने देगी क्योंकि हर एक को स्त्री के गर्भ से ही जन्म लेना है।


अतः कपड़े और व्यवहार की मर्यादा के खिलाफ कोई भी नहीं हो सकता किंतु इस लक्ष्मण-रेखा के अंदर पुरुष भी लाए जाने चाहिए।


नारी के प्रति दृष्टिकोण पर 8 मार्च को मेरे द्वारा व्यक्त किए गए विचार की रिकॉर्डिंग प्रस्तुत है, समालोचना की कृपा करें..👇🏻☝️


शिष्य-गुरु संवाद से डॉ. सर्वजीत दुबे🙏🌹